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सत्याग्रह-आत्मबल


दशाके कारण मान लेते हैं कि हमें ‘ऐसा ही करना चाहिये', यह हमारा फ़र्ज है, यह हमारा धर्म है।

अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी[१] मालूम हो उसे मानना नामर्दगी है, तो हमें किसीका भी जुल्म बाँध नहीं सकता। यही स्वराज्यकी कुंजी है।

ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगोंको मान लेना चाहिये, यह तो अनीश्वरी[२] बात है, एक वहम है। ऐसी हजारों मिसालें मिलेंगी, जिनमें बहुतोंने जो कहा वह गलत निकला हो और थोड़े लोगोंने जो कहा वह सही निकला हो। सारे सुधार बहुतसे लोगोंके ख़िलाफ जाकर कुछ लोगोंने ही दाखिल करवाये हैं। ठगोंके गाँव में अगर बहुतसे लोग यह कहें कि ठगविद्या सीखनी ही चाहिये, तो क्या कोई साधु ठग बन जायगा? हरगिज नहीं। अन्यायी कानूनको मानना चाहिये, यह वहम जब तक दूर नहीं होता तब तक हमारी गुलामी जानेवाली नहीं है। और इस वहमको सिर्फ़ सत्याग्रही ही दूर कर सकता है।

शरीर-बल का उपयोग करना, गोला-बारूद काममें लाना, हमारे सत्याग्रहके कानूनके ख़िलाफ है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि हमें जो पसंद है वह दूसरे आदमीसे हम (जबरन्) करवाना चाहते हैं। अगर यह सही हो तो फिर वह सामनेवाला आदमी भी अपनी पसंदका काम हमसे करवाने के लिए हम पर गोला-बारूद चलानेका हकदार है। इस तरह तो हम कभी एकराय पर पहुँचेंगे ही नहीं। कोल्हूके बैलकी तरह आँखों पर पट्टी बांधकर भले ही हम मान लें कि हम आगे बढ़ते हैं। लेकिन दरअसल तो बैलकी तरह हम गोल गोल चक्कर ही काटते रहते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि जो कानून खुदको नापसन्द है उसे माननेके लिए आदमी बँधा हुआ नहीं है, उन्हें तो सत्याग्रहको ही सही साधन[३] मानना चाहिये; वरना बड़ा विकट[४] नतीजा आयेगा।

  1. गैर-इन्साफ़वाला।
  2. ला-खुदाई।
  3. जरिया।
  4. खतरनाक।