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हिन्द स्वराज्य


बेकार सवाल उठाता है। जिसे सत्यकी ही राह लेनी है, उसके सामने ऐसे धर्म-संकट[१] कभी आते ही नहीं। ऐसी मुश्किल हालतमें आ पड़े तो भी सत्यवादी उसमें से उबर जाता है।

अभयके बिना तो सत्याग्रहीकी गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं चल सकती। अभय संपूर्ण और सब बातोंके लिए होना चाहिये। जमीन-जायदादका,झूठी इज्ज़तका,सगे-सम्बन्धियोंका,राज-दरबारका,शरीरको पहुँचनेवाली चोटोंका और मरणका अभय हो, तभी सत्याग्रहका पालन हो सकता है।

यह सब करना मुश्किल है, ऐसा मानकर इसे छोड़ नहीं देना चाहिये। जो सिर पर पड़ता है उसे सह लेनेकी शक्ति कुदरतने हर मनुष्यको दी है। जिसे देशसेवा न करनी हो, उसे भी ऐसे गुणोंका सेवन करना चाहिये।

इसके सिवा, हम यह भी समझ सकते हैं कि जिसे हथियार-बल पाना होगा, उसे भी इन बातोंकी ज़रूरत रहेगी। रणवीर होना कोई ऐसी बात नहीं कि किसीने इच्छा की और तुरन्त रणवीर हो गया। योद्धा (लड़वैया) को ब्रह्मचर्यका पालन करना होगा, भिखारी बनना होगा। रणमें जिसके भीतर अभय न हो वह लड़ नहीं सकता। उसे (योद्धाको) सत्यव्रतका पालन करनेकी उतनी ज़रूरत नहीं है, ऐसा शायद किसीको लगे। लेकिन जहाँ अभय है वहाँ सत्य कुदरती तौर पर रहता ही है। मनुष्य जब सत्यको छोड़ता है तब किसी तरहके भयके कारण ही छोड़ता है।

इसलिए इन चार गुणोंसे[२] डर जानेका कोई कारण नहीं है। फिर, तलवारबाज़को और भी कुछ बेकार कोशिशें करनी पड़ती हैं, जो सत्याग्रहीको नहीं करनी पड़तीं। तलवारबाज़को जो दूसरी कोशिशें करनी पड़ती हैं, उसका कारण भय है। अगर उसमें पूरी निडरता आ जाय, तो उसी पल उसके हाथसे तलवार गिर जायगी। फिर उसे तलवारके सहारेकी ज़रूरत नहीं रहती। जिसकी किसीसे दुश्मनी नहीं है, उसे तलवारकी ज़रूरत ही नहीं है। सिंहके सामने आनेवाले एक आदमीके हाथकी लाठी अपने-आप उठ गई। उसने

  1. दुविधा।
  2. सिफ़तोंसे।