पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१०७

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प्राणी के लिए कोइ अवाकाश नहीं है। (३) कोटि क्र्म मे से क्बीर का तात्पर्य य्ह है कि अनेक दुषकर्म क्षण मे नष्ट हो जाते हैं, प्राभावहीन हो जाते है। शब्दाथृ- त्रम=कर्म। दुष्कर्म=पेन=नष कर दें। पलक-क्षण। रंचक=लेश्मात्र भी। नाउं=नाम। जुग=युग।पुन्नि= पुन्न=पुण्य। ठाउं=ठांव स्थान

       जिही ह्र्री जैसा जाँरिग्याँ,तिन कूँ तैसा लाभ।    
       श्रोसों प्यास न भाजई जब लग धसै न श्राभ॥

स्न्दर्भ-- कबीर ने प्र्स्तुत साखी मे कहा है कि माधव कि हरि के प्र्ती जैसी भावाना होती है, उसी प्राकार सिद्धि उसे समप्राप्त होती है। केवल अभिलाशा करने मात्र से उपलबिध नहीं होती है' संतुष्ट होती यथार्थ रूप मे उपलबिध हो जाने पर। भावार्थ- हरि को जिसने जिस रूप में जाना उसको उसी रूप मे लाभ होता है। श्रोम से प्यासे या पिपासा नहीं दूर होती। जब तक पानी नही प्रवेश करता तब तक पियासा कैसे शात होगी।

       विशेष- क्बीर ने प्र्स्तुत साखी की प्र्थ्म  पंक्ति मे यह भाव व्यक्त किया है कि हरि कि साधना जिसने जिस भाव से को तदनुसार उसे  सफलता प्राप्त होती है(2)कबीर की प्रस्तुत पंक्ति पर संसकृति उक्ति याहशी भावना यस्य सिद्धिभंवति ताहशि का पूर्ण प्रभाव है(3)मानव के विश्वास ही वास्तविक रूप से फलदायक होते है। जैसा विश्वास होता है उसी प्रकार की प्राप्ति होती है । (4)"ओ पो प्यास न भाजई" से तैत्पर्य है । माया रूपी ओस के चाटने से भौतिक ताप या लौकिक विषमताएं दूर नही होती है । पयास या अभाव या तृणा तभी दूर होती है जब ब्रह्मभक्ति या सदगुरु के उपदेश रूपी शीतल जल की प्राप्ति होती है।
       शब्दार्थ-जिहि=जिसने । जणिया= जनिय-पहचाना ।  तिन =उन। कूं=को ।श्रोसो =श्रोस से ।भाजई = भगती है,दूर होती है । धसै प्रवेश करे श्राभ-जल।
        राम पियारा छांडि करि, करै श्रान का जाप।
        चेम्वां केरा पृत ज्यूं, कहे कौन सूं बाप।