पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/११५

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जीवन मे घटित करने का प्र्यत्न किया है वास्नाओ और माया द्वरा प्रद्ग्व अग्नि को नाम सुमिरण के जल के द्वारा ही प्रशन्त किया जा सकता है कबीर ने यह। पर अत्सन्थ सुलभ उकिथत के द्वरा आध्यत्मिक ज्गत के भाव को प्र्भ्ज्शलि बनने की चेपठ की है।(२) कबिर.... लाइ से तत्प्ये है कि अगीन चारो देशओ, सवन्तरा लगी है और उसके प्रभाव से म्रन चम्त्क्रुत हो उठा है सन्सर के स्ंव्त्र माया की अग्नि प्रज्वलिथ है । और मन उस्मे रमा हुआ या अत्त्य्न्थ अनुर्क्थ है ।(३) वेगे लेहु बोकाइ −शिध ही इस अगिन भकत। लो । कबिर ने येह वेगे शब्ध का प्रयोग किय है ।जिवन किसि पल विनिश्त हो स्क्ता है । अत: मानव के लिए यह आव्श्य्क है कि लत्यन्थ श्रेधता के सथ जीवन की विगदे क्रम मे सुधार के करले ।(४) हरि ...घडा से तात्पय्ं है कि हरि नाम रुपि जल का घधा हाथ मे है ।

  शब्धर्थ- चमकिया । = चम्त्र्कुन  चाहु= चारो । दिसि = दिशा । लाइ = 
  ज्वाला अगनि । हाथु = हाथौ मे । वेगे = श्रेध हो । लेहु = लओ । छुम्बक = व्रुश 
         
                  ३  विरह को त्रिपजग