पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/११६

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श्राफ दिसोल" अर्थात आत्मा की अङ्कार्पूरग रात्रि" का प्र्यौग किया है।(२) "अन्तर प्र्जल्पा" से तात्ययम है अन्तस प्रज्वलित हो गया। विरह पुंज के प्रकट होने पर अन्तस वसनाऒ का सफल बन हुअ होत था, वह विरहागिन के प्रज्वलित हो उठा।

शब्दार्थ - रात्य = रात में। रुनौ = रोई। वचौ = कू= को। प्रजल्या = प्रज्वलित हुआ। प्रगटया = प्रकट हुआ। पुज = धनोभूत।

भंबर कुजा कुरलियाँ, गरजि भ्ररे सन्न ताल। जिनि थैं गोविन्द वीछुटॆ, तिनके कौएगा् हवाल॥२॥

संदर्भ - आकाश कौच पंीं के आंत क्रन्दन से परिपूरित हो उठा। जलद का अन्त्स आंद्र हो उठा और उसके रुदन से जलाशय ऒतन्पोत हो उठा। परन्तु जो प्रारगी गोविन्द से विमुरव हैं, उनके प्रति कौन सवेद्नशील होगा।

भावार्थ - कौंच पक्शी ने आकाश मे आंत क्रन्दन किया जिससे आद्र्ं होकर घनषयाम ने सरोवरो को जल से ऒनन्प्रोन कर दिया। परन्तु जो गोविन्द अर्थातू भगवान से विमुख है, उनकॊ तया दशा होगो। भगवान से वियुक्त उन प्रारिगयो पर कौन कृपा भाव प्रदशित करेंगे।

शब्दार्थ - अम्बर = आकाश। कुंजा = क़ौज। गरजि = गजंन करके। पै = से। वोछुटे = विछुदे = वियुक्त। कौरग = कौन। हवाल = हाल।

चकवी बिछुटी रैरिग की, श्राइ मिलि परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति॥३॥

संदर्भ - चकवी रात्रि के अभिशव्त क्षरांगो मे, अभिशाप वश प्रिय से वियुत्त्क हो गई, परन्तु सूयं की किर रगो के आलोकमय वातावर रगा मे वह अरने प्रिय से पुन मिल गई। परन्तु माया के प्रभाव से परम पिता विमुक्तुपा्गा से फ़भो नहीं मिल पाती है।

भावार्थ - रात्रि को चिछुबो हुई चकवो, प्रनात के क्षर््गो मे प्रियनम से पुना मिल गई। पर्ंतु माया के प्रभाच मे भगवान के सम्पकं मे दृदक प्रारगो को दाररग मे कभी नही, पहुच पाता है।

शब्दार्थ- रैरिग = रैन = रात्रि। परभाति = प्रभात। राति = रात = रात्रि।

घामर मुग्व नां रैन सुग्न, ना सुग्व मुविनै माहि। कबीर बिम्दुटवा राम मूँ, नां मुम्व धूप न छाँद्द॥४॥