पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/११७

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सन्धर्भ - राम से वियुक्त प्रारणी को कभी किसी दशा या परिस्थिति मे सुख नही प्राप्त् होता हे। भावार्थ- कबीर् कह्ते है कि राम से वियुक्त प्रारणी को न रात मे सुख हे,न दिन मे; न वह स्वपन मे शान्ति प्राप्थ करते हे न जाग्रतावस्था मे। धूप अथवा छाह मे भी वह शाति नही प्राप्त कर पाता हे। तात्पर्य यह हे कि ब्रह्म की शरण ही समस्त सुख हे। वही सुख निघान हे, वहि शान्तिनिकेतन हे। शब्दार्थ- बासर्=बासर्=दिवस। रैन= रात्रि। सुपिनै = स्वपन मे।

विहिन ऊभि पॱथ सिरि, पॱथी बूफ्भे 
एक सवद कहि पीव का, कवर मिलैगे त्राइ॥
सन्दर्भ -- प्रस्थुत साघी मे विरहिणी की व्यग्रता, अधीरता, मानसिक व्यथा को व्यक्त किया गया है।

भावार्थ --- विरहिणी मार्ग पर खड़ी पथिको से पूछ रहि है कि प्रिय का समाचार बताइए। वे कब आकर मिलेगॆ, अनुग्रहित करैँग़े।

शब्दार्थ -- ऊभी = खडी। सिरि = सिरे पर। वूभ्फ = पूॱछे। घाई = दौड कर । कवर = कवरे, अरे कव।

वहुत दिनन की जोवती, बाट तूम्हारी राम। जिव तरसै तुभ्फ मिलन कूँ, माने ना ही् विश्राम ॥

सन्दर्भ -- प्रस्तुत साखी मे आत्मा रूपी विरहिगणी की विरह भावना बढे मार्मिक शब्दों मे व्यक्त हुइ हैं।

भावार्थ -- हे राम ! हे प्रिय ! बहुत काल से अर्थात् से तुम्हारी वाट जोह रही हूँ,तुमहारी प्रतीक्षा मे अनुरवत हूँ। थापित करने के लिए मेरा जी व्यग्र है और मन मे शाति नहीं हैं ।

शब्दार्थ -- जोवती = जोहती = प्रतीक्षा करती। वाट = मार्ग। जीव = जी, प्राण । विश्राम = शान्ति।

विरहिन ऊठै भी पडै, दरसन कारनी राम। मूवाॅ पीछे देहुगे सो दशन किही काम॥७॥

सन्दर्भ -- प्रस्तुत साखि मे विरहिनी की क्रुशावस्था, और विरह मे का चित्रण किएे गये हैं ।

भावार्थ -- हे राम ! विरहिनि तुम्हारे दर्शन के लिए उठते हैं और पुनः गिर पडती हैं । यदि म्रुथ्यु के अनन्तर तुमहारे दर्शन र्भी तो किस काम् के, उस्से क्या मान होगा।