पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१४०

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शब्दार्थ्-बासुरि=दिन । निध्य=निधि । तन भीतरि मन मानियां, बाहरि कहा न जाइ । ज्वाला तैं फिर जल भया,बुझी बलंती लाइ ॥३१॥ सन्दर्भ-अब मन अन्तर्मुखी हो गया । भावर्थ-ह्रदय मे ही मन मुग्ध होकर सीमित हो गया । अब यह बाहर कही नही आता है । मोह की ज्वाला शान्त हो गई और अग्नि पीतल हो गई ।