पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१४८

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जरर्ग्ग को अग } है उसका पता नही लगाया जा सकता है उसी प्रकार जिस आत्मा का परमात्मा मे समावेश हो गया उसको भी नही खोजा सकता है।

   शब्दार्थ - हेरत-हेरत = खोजते-खोजते। हिराइ = खो जाना। हेरो = पता लगाना।
     हेरत हेरत हे सखी, रहया कबीर हिराइ।
    समन्द समाना बूँद में, सो कत हेरया जाई॥४॥
 सन्दर्भ -- ह्र्र्रदय स्थित ईश्वर को देखना मुशकिल है।
 भावार्य -- कबीर की आत्मा सासारिक आत्माओ से कहती है कि हे सखी! परमात्मा को खोजते-खोजते मैं स्वयं खो गई। समुद्र (परमात्मा) बूंद (आत्मा) के अन्तःकरण मे ही व्याप्त है उसको केसे खोजा जा सकता है।
    शब्दार्थ -- समद = समुद्र।
      ८. जरर्ग्ग कौ त्रंग

भारी कहाैं त यहु डराैं, इलका कहूॅ ताै भूठ । मैं का जांरगाै राम कू, नैनूँ कपहूॅ न दीठ ॥१॥ सन्दर्भ -- ब्रह्म के स्वरुप का वरगंन नहीं किया जा सकता है। भावार्य -- यदि उस परमात्मा को भारी कहा जाय तो बहुत ढर सगता है पयॊकि वह निराफ़ार है फ़िर भारी कैसे हो सकता है? और यदि हल्का कहूँ तो यह भी असत्य हो है। क्पोंफ़ि मेंने अपने भोतिक नेबो से परमात्मा को देखा ही नहीं है फिर उनके अस्तित्व के विषय मे फह केमे सकता है।

     शब्दार्थ -- दीठ = देखा।
         दीठा है तो कस कहू, कधा न को पतिचाइ।
        डरि जैसा है तैसा रहो, तू छरिपि हरिषि गुण गाइ ॥२॥