पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१६०

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भरा हो जाता है और फिर वह ठूँठ का ठूँठ हो रह जाता है । ठोक उसो प्रकार यह जीवन भी थोड़े दिनो, तक आभा बिखेर कर नष्ट हो जाता है। शब्दार्थ - खंखर= नष्ट हो जाते है ।

कबीर कहा गरिबियौ, देही देखि सुरंग।

बिछड़ियँ मिलिबौ नही ज्यूँ कांचली भुवंग।॥६॥ संदर्भ - शरीर को छोडने के बाद आत्मा उसमे प्रविष्ट नही होती इसलिए जीव को गवं नही करना चाहिए। भावार्थ - सुरग = सुन्दर । वोछडिया = वियुक्त होने पर । कबीर कहा गरबियों ,ऊचे देखि श्र्वास । काल्हि परयू मै लेटेएगा, ऊपरी जामे घास।।

संदर्भ- सासारिक ऐश्वर्य पर गवं नहो करना चाहिए ।

भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओ को देखकर उस पर गवं नही करना चाहिए । जोव यह नही जानता कि णोघ्र हो उसे कन में लेटना पढ़ेगा और कब के ऊपर घाम उग आएगो तेरा सारा चैभत्र नष्ट हो जायेगा । शब्दार्थ- प्रवास = घर म्वै=भू । भावार्थ- उबोरदास जो कहते है कि नमें ने


कबीर कहा गरबियाँ , फाल गहे फर फेस । नो जाएगे कहा मारिसी , कै घरि कै परदेस।।१२॥