पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१६३

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१५२] [कबीर की साखी

   शब्दार्थ-प्रीतिड़ो = प्रेम 
 कबीर मन्दिर लाष का, जड़िया हीरैं लालि॥
 दिवस चारि का पेषरणां, विनस जाइगा काल्हि॥१६
  सन्दर्भ- शरीर की साज सज्जा चन्द दिनो की है उसके बाद यह नष्ट हो जायेगा।
  भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि शरीर रूपी मन्दिर लाख का बना हुआ है इसमे हीरे और  लाल जड़ै हुए हैं यह देखने में बहुत आकर्षक है किन्तु इसका यह आकर्षण शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा और यह(पाण्डवो के) लाक्षा गृह के कि समान जलकर नष्ट हो जयेगा।
  शब्दार्थ- लाष=लाक्षा, लांख।
कबीर धूलि सकेलि करि, पुड़ी ज बाँधी एह।
दिवस चारि का पेषरणां अन्ति षहे की षहे॥२८॥
 सन्दर्भ- रूपक के द्वारा शरीर की क्षण भंगुरता के प्रति सकेत है।
 भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर धूल को इकट्ठा करके पुडिया के समान बाँध दिया गया है। इसकी साज-सज्जा कुछ ही दिनो की है और अन्त मे यह जिस मिट्टी से बना है उसी मिट्टी के रूप मे परिवर्तित हो जएगा।
 शब्दार्थ- सकेलि=एकत्रित कर। पुडी= पुडिया षेह=धूल।
 
कबीर जे धन्धै तौ धूलि, बिन धधै धूलै नहीं।
तैं नर बिनहे मूलि,जिनि,धंधै मै ध्याया नहीं॥२१॥
 सन्दर्भ- प्रभु प्रप्ति संसार में रहकर ही सम्भव है।
 भावार्थ- कबीर का कहना है कि मनुष्य इस संसार मे सत्कर्मो में प्रवृत्त रहते हैं उनकी आत्मा स्वच्छ हो जाती है क्योंकि बिना कर्मों के आत्मा स्वच्छ नही हो सकती। वे मनुष्य तो जाते ही नष्ट हो गये जो इस संसार मे कर्मों मे प्रवृत्त होते हुए इश्वर का स्मरण नही करते।
 शब्दार्थ- धधै=कर्म। धूलि=घूलना। विनठे= नष्ट हो गये।
कबीर सुपनै रैनि कै, उघड़ि आए नैन।
जीव पडया बहु लुटि मैं, जागै तौ लैं रंग नदैरगा॥२२॥