पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१७

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थी | इसलिए उन्होने नारी कि भोगमय स्वरूप की बडी निन्दा की है | आध्यात्मिक पथ से भ्रष्ट करने के कारगा कबीर ने स्त्री को सर्पिरगी के समान भयंकर व्याघ्र के समान घातक तथा भक्ति एवं मुक्ति से पतित करने वाली कहा है | स्थान - स्थान पर कबीर ने नारी को माया आदि शब्दो से भी सम्बोधित किया है | परन्तू साथ ही कबीर ने नारी के कल्यागाकारी रूप का समर्थन भी किया है| कबीर ने सती स्त्री की प्रशंसा की है कारगा कि उसका ह्रुदय और मन पवित्र रहता है | यह पति के साथ अपनी जीवन लीला समप्त कर देती है| इसी प्रकर कबीर ने पति- ब्रसा नारी का भी बडा समर्थन किया है| कबीर के लिए मैली-कुचैली पतिब्रता भी बन्दनीय है| पतिब्रता नारी को कबीर ने शूर और दोनो के समान उच्च और अभिनन्दनीय माना है| सक्षेप मे कबीर ने नारी के उस स्वरूप की निन्दा की जो मानव को आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने मे रोकता है| यदि वह इस दोष से रहित है ति वह सर्वथा वन्दनीय है|

      मुसलमानो कि आक्रमग ,अकाल ,अनावृष्टि ,लुटेरो तथा विजेता वर्ग के

शोषगा ने कबीर के समय तक देश को नितान्त कंगाल बना दिया था| इसका

              प्रभाव मध्यवर्ग , निम्नवर्ग ,और किसान तथा मजदूरो पर 

श्राथिक परिस्थिति विशेष रुप से पडा | आर्थिक विनाश और अन्नाभव के

              कारगा जनता के लिए जीवन का प्रश्न अत्यन्त विषम 

वन गया| जनता के इन वर्गो के लिए इश्वर के अतिरिक्त और किसी का सहारा नही था| इसलिए कबीर ने तत्कालीन जनता को सन्तोष घरगा करने का उपदेश


    १ - कामिनी सुन्दर सर्पिगी जो छेडै तेहि खाय  |
        जो गुरुचरन न राचिया तिनके निकट न जाय||
    २ - नैनो काजर पाइ कै गाढै बाधे केस  |
       हाथो मेहदी लाइ के बाधिनि खाया देस  ||
    ३  - नारी नसावै तीन गुन जो नर पासे होय |
       भक्ति-मुक्ति निज ध्यान मे पैठि न सक्कै कोय  ||
    ४  - साती न पीसै पीसना जो पीसै सो राड|
       सधू भीख न मांगही जो मांगै सो भांड   ||
    ५  - पतिवरता मैली भली काली कुचित कुरुप |
       पतिवरता के रुप पर वारो कोटी सरुप  ||
    ६  - सूरा के तो सिर नही दाता के धन नाहि |
       पतिवरता के तन नही, सुरति वसै पिउ माहिं  ||