पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१८०

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मन क़ौ अंग] [१६६

  शब्दार्थ -औघडं=एक प्रकार के साधु |एकज दोसत हम किया,जिस गलि लाल कबाइ। सब जग धोबी घोइ मरै,तौ भी रंग न जाय॥११।।
  सन्दर्भ -प्रेम का रंग किसी के छुडाए नहीं छुटाता है।

भावार्थ् - मैने एक ऐसा मित्र बनाया है कि जिसके गले मे लाल कपडा चंघा हुआ है अर्थात् जो प्रेम के रंग से ओत-प्रोत है|यह प्रेम का रंग इतना पक्का है कि संसार के सब घोवो मिल करके भी यदि इसके रंग को धोकर छुडाना चाहें तो नहीं छुडा सकते है|

  शब्दार्थ--कावाइ =कपडा  |
    पाँणी हीं तैं पातला,धूंवाँ हीं तैं भ्कींण|
    पवनाँ वेगि उतावला ,सोदोसत कबिरै कीन्ह ||१२||
 संदर्भ--कबीरदास ने निराकार ब्रह्म से मित्रता जोडी है |उसी के गुणो का वखान है|
भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि जो पानी से भी पतला घुएं से भी हल्का,और पवन के वेग से भी अधिक वेग वाला है ऐसे परमात्मा से मित्रता की है|
  शब्दर्थ-उतावला=तीव्र|
     कबीर तुरी पलांणियाँ,चाबक लीया हाथि|
     दिवस थकाँ साँई मिलौं,पीछे पडिहै राति||१३||
  संदर्भ-इसी जीवन मे परमात्मा के दर्शन करने के लिए मनरूपी घोडे को कसने के लिए समय का चाचुक लेना पडेगा|
  भावार्थ-कबीरदास जी कहते है कि मैने अपने मन रूपी घोडे को कस करके,पलाद करके सयम के चाचुक को अपने हाथ मे ले लिया है अर्थात् मन पर पूर्ण रूपेण नियन्त्रण कर लिया है|मै यह चाहता हूँ कि जीवन रूपी दिन का अंत होने के समय तक ही अर्थात् इसी जीवन मे ही परमात्मा के दर्शन कर लू क्योकिं फिर तो मृत्यु रूपी रात्रि आ जायेगी और जीव को अचेत कर देगी|
  शब्दार्थ-तुरी=घोडी|पलाडियाँ=कसकर चढने के लिए तैयार कर लिया है|