पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१९८

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माया कौ अंग ] [ १ ८७

सह्ब्दार्थ-- तरग्रा=नीचे । निवर्ति = निवृति । परवर्ती = प्रवृति ।

कबीर इस सन्सार का, भूक्ता माया मोह । जिहि घरि जिता वंथावणा, तिहिं घरि विता अँदोह ।।२८।।

सन्दर्भ-- सुख के साथ दुख भी मिला होता है ।

भावार्थ--कबीरदास जी कहते है कि इस संसार का माया मोह सभी झूठा प्रपंच है । जिस घर मे जितनी ही अधिक प्रसन्नता आनन्द-मगल दिखाई देता है, वहाँ उतना ही अधिक दुख भी होता है ।

शाब्दार्थ---वंधावणा = वघन । अन्दोह = दुख ।

माया हम सौं थी कह्गा, तू मति दे रे पूठि । और हमारा हम बलू, गया कबीरा रूठि ।।२९।।

सन्दर्भ---आत्मवल वाले व्यक्ति ही माया से सबंध विच्छेद कर पाते है । भावार्थ---माया ने हमसे (जीवात्मा से) यो कहा कि तू मुझ को मत छोड है किन्तु यह हमारा ही आत्मबल है कि मैं (कबीरदास) माया से अप्रसन्न हो गया और उस माया से रूठ गया, अप्रसन्न हो गया ।

शब्दबर्भ--पूठि=पीठ देना ।

चुगली नीर बिटाजिया, सायर चढ़या कलंक । और पखेरू पी गये, हँस न बोये चंच ।।३।।

सन्दर्भ-- भक्तजन विषय भीगी से आसक्त नही होते हैं ।

भावार्थ-माया रूपी बगुली ने आत्मा के जल को दूषित कर दिया, इससे संसार रूपी सागर भी कलकित हो गया अन्यपक्षी, ससारिक मनुष्य तो इस विषय वासना के पानी को पी गए किन्तु मुशमैंत्माओं (हसो) ने इस जल को छुमा तक नहीं है ।

शब्दार्थ--बिटा लिया: समाप्त कर दिया । सायर = सागर । ह स=मुक्तादमा ।

कबीर माया जिनि मिलै, सौ परिया दे बाँह । नारद से मुनियर मिले, किसी भरोसौ त्यांह ।। ३१ ।।

संदर्भ--माया का कोई भरोसा नहीं है उसके फन्दे से नहीं पडना चाहिए ।

भावार्थ-- कबीरदास जो कहते हैं कि अगर माया सैकडो प्रलोभन देकर के तुझे फ्साना चाहे तो भी उसके फन्दे से नहीं पडना चाहिए । जव इस माया ने