पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/१९९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


९८८ ] [ कबीर की साखी

नारद ऐसे प्रभु भत्तों तक को अपने जाल मे फाम्स लिया है तो फिर इसका भरोसा कैसे किया जा सकता है ।

शब्दार्थ-गिले = नष्ट कर दिये ।

माया की मल्ल जग जाल्या, कनक काँमिर्णएँ लागि । कहू, धौं, किहि विधि राखिए, रूई पलेटी आगि ॥३२॥

संदर्भ---कनक और का मिनी के प्रभाव मे पडा मनुष्य अधिक समय तक नहीं टिक सकता । भावार्थ-कनक और कामिनी-धन और रुत्री के लोभ से फँसकर सारा संसार मसा के जल से फँस गया और उसी की लपट मे जलने लगा भस्म हो गया । माया तो रूई मे लपेटी हुई आग कि समान् है जिस प्रकार रूई में लपेटी हुई साग थोडे समय से ही रूई को जलाने लगती है उसी प्रकार माया भी संसार को जलने लगती है । विशेष-निदर्शन, अलंकार । शब्दार्थ्झ--भ्फल=अग्नि । प्लति=लपेटी हुई 1


१६.चांगक कौ त्रंग

जिव बिलंव्या जीव सौ, अलख न लखिया जाइ । गोविन्द मिले न झल बुझे, रहि बुझाइ बुझाइ ।। है 11 सन्दर्मा--शाया जन्य दुखी की ज्जाला प्रभु दर्शनों से ही शात हो सकती है । भावार्थ-एक जीव दूसरे जीव का सहारा ले रहा है अलक्ष (नरत्कार) परमात्मा कौ कोई नहीं देखता 1 जब तक प्रभू मिलन नहीं होगा तव तक सांसारिक त्तापौ कि अजित का बुझना शान्त होना असम्भव है भले ही इसके बुझाने के अनेको प्रयत्न किये जार्य । शउदाथ९---विलंव्या=: सहारा लिया । अलप उ-:: निराकार यहा । झच८-न्द्र अग्नि 1 इहि हैंउदार के कारएँर्दे, जा; जदृन्हर्या निस जाम । स्वामी पणों जु सिरि चड़यी, सस्था न एकौ काम 11 २ 1।