पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२००

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चांरगक कौ अग] [१७६

   सन्दर्भ -- के काररग जोव किसी लोक को भली भांति सभाल नही पाता है ।
   भावार्थ- सांसारिक जीव अपनी उदरपूर्ति के लिए रातदिन संसार मे भटक-भटक कर याचना किया करते है किन्तु उनके अदर जो स्वामीपन की भावना क अहंकार होता है उसके कारण उनका एक भी काम नही बान पाता है न यह लोक सुख कर हो पाता हे और परलोक मे ही मुक्ति का मांग बन पाता है।
   शाब्दार्थ -स्वामी परगौ = स्वामीपना , सर=सिद्भ हुआ,बना ।
    स्वामी हुरॅगाँ सोहरा, दोद्धा हुरॅगाँ दास ।
    गाडर श्राँरगी ऊन कूँ, बाँधी चरै कपास ॥३॥
  सन्दर्भ- ईश्वर भक्त बनना अत्यन्त कठिन है ।
  भावार्थ- इस संसार मे स्वामी बनना तो सरल है कोई भी व्यक्ति अपने अहंकार को प्रदर्शित कर कुछ व्यक्तिअयो पर अपना स्वामित्व प्रदर्शित कर सकता है किन्तु परमात्मा का भक्त बनना अत्यन्त कठिन है। जिस प्रकार भेड को ऊन प्राप्ति के लिए पाला जाता है किन्तु वह घर आकर कपास को भी चर लेती है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भक्त मे यदि अह की भवना आ जाती हैइ तो उसका परलोक और यह लोक दोनो नष्ट हो जाते हैं।
   शाब्दार्थ-सोहरा=साल। दोद्धा=दुलंभ। गाडर भेड।
    स्वामी हुवासीत का, पैत्राकार पचास।
    राम नाम काँठै रहया, करै सिषाँ की श्रास ॥४॥
   सन्दर्भ--सांसारिक व्यक्ति दम्भ मे ही लिप्त रहते हैं।
   भावार्थ--हे जीवात्मा । तू करग भर सपत्ति क स्वमी होकर भी दभ मे आकर पचासो सेवक बना रखे हैं ह्रिदय से तूने कभी राम का नाम लिया ही नहीम केवल जी से ही राम का उच्चारण करता रहा और अबतू शिष्य बनाने जकी आशा करता है।
   शाब्दार्थ-सीत=दाना,करग । पैकाकार=सेवक । काठै=कठ ।
     कबीर तष्टा टोकरगीं, लीयौ फिरै सुभाइ ।
     राम नाम चीन्हैं नही,पीतलि टी कै चाइ ॥५॥
   सन्दर्भ--जीव उदर पूर्ति के लिए ही भ्रमण करता रहता है राम का नाम नही लेता है । उसी के प्रति सकेत है ।
   भावार्थ-- कबीरदास जी कहते हैं कि तू अपने स्वभाव के अनुसार तसला और टोकनो लिए हुए इधर-उधर घूमकर खाने पीने का प्रबन्ध करता रहता है । तू