पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२०५

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भावार्थ-शंकर की पूरी काशी मे निवास करते हुए और गंगाजी का निर्मल जल पीते हुए लोग मुक्ति की आशा करते है किन्तु कबीर दास जी इस प्रकार कहते है, बिना हरि नाम के स्मरण के जीव को मुक्ति मिलना असंभव है।

शब्दार्थ- कासी काठैं= काशी मे निवास करते हुए।

कबीर इस संसार कौं; समझाऊॅ कै बार। पूँछ ज पकड़ै भेद की, उतर या चाहै पार॥२०॥

सन्दर्भ- माया का आश्रय ग्रहण कर कही जीव संसार-सागर को पार उतर सकता है?

भावार्थ- कबीर दास जी कह्ते है इस संसार के जीवों को कितनी बार समझाऊँ की माया का आश्रय ग्रहण कर भवसागर को पार उतरने की चाह रखना बिलकुल व्यर्थ है।

शब्दार्थ- भेद= माय

कबीर मन फूल्या फिरै, करता हू मैं ध्रंम। कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखे भ्रंम॥२१॥

सन्दर्भ- वाह्याचरण से कही मुक्ति मिलती है?

भावार्थ- कबीर दास जी केहते है कि लोग अपने मन मे बहुत प्रसन्न रहते है कि मैं धर्म कर रहा हूँ यद्यपि वे वाह्याचरण को ही धर्म के अंतर्गत मानते है और उसीसे मुक्ति की कामना करते हैं। वह भ्रम का निवारण कर इस बात पर विचार नहीं करता कि अपने सिर पर करोड़ो कुकर्मों का भार लेकर चल रहा हैं फिर मुक्ति मिले तो कैसे?

शब्दार्थ- ध्रम=धर्म। क्रम=कर्म। चेति=चेत कर, सावधान होकर। भ्रंम=भ्रम।

मोर तोर की जेवड़ी, बलि बन्ध्या संसार। कांसि कडूँवा सुत कलित, दाभन बरम्बार॥२२॥

संदर्भ- अपने और पराए की भावना के कारण जीव को संसार से मुक्ति नहीं मिलती।

भावार्थ- मेरे तेरे की भावना रूपी रस्सी में बलि के बक्ड़े के समान सारा संसार बंधा हुआ है। पुत्र एवं स्त्री रूपी काय एवं कंठुआ के कारण जीवात्मा को आवागमन से मुक्ति नहीं मिल पाती हैं। वह बार बार आवागमन चक्र मे पड़ कर संसार नापो मे दग्ध होता रहता हैं।