पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२१७

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                                                  [कबीर की साखी

सन्दर्भ--पचेन्द्रियो को वश मे करने वाला व्यक्ति हो सच्चा निष्काम भक्त है।

भावार्थ--ईश्वर प्राप्ति को सभी सरल कह्ते है किन्तु उस सरल ब्रह्म् को कोइ पह्चान नही पाता है। जो व्यक्ति पांचो इन्द्रियो को अपने वश मे कर लेता है वही सहज और निष्काम भक़्त होत है।

शब्दर्थ-- पाँचू=पाँचो इन्द्रियो को परसती=वश मे। विशेष- पुनरुक़्ति अलंकार।

सहजैं सह्जैं सब गए, सुत बित काँमणि कांम । एकमेक है मिलि रह्या, दाखि कबिरा राम॥३॥

सन्दर्म्-- संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है। केवल ईश्वर भक्त ही परमात्मा मे तदाकार हो जाता है।

भावार्थ--कबिरदास जी कहते हैं कि पुत्र,धन,स्त्री और कामनाएं धीरे- धीरे एक एक करके सभी चले गये। और सब के नष्ट होने पर सब से वैरागय होने पर भक्त कबीर ईश्वर से मिल कर एकाकार हो गये।

शब्दार्थ --सह्जैं सह्जैं=शनै:शनै।

सह्ज सहज सबको कहै,सहज न चीन्हैं कोइ । जिन्ह सह्जैं हरिगी मिलै, सहज कहीजै सोइ ॥४॥४०५॥

संदर्म-- ईश्वर को सरलता से प्राप्त कर लेना ही सहजावस्था है। भावार्थ--ईश्वर प्राप्ति को सरल तो सभी कहते है किन्तु उस सरल को (ब्रहम् को) कोइ जान नही पता है। जिस व्यक्ति को सुगमता से प्रभु मिल जायें यही सहन साघक है और वही अवस्था सहजावस्था है। शब्दार्थ--हरि जी = परब्रम्ह,परमात्मा ।