पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२२६

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भेष कौ अंग़़]८ [२१५ भीतर ही निवास क२ते है तू उन्हो से अपने प्रभु की लौ लगा उन्ही की प्राप्ति का प्रयत्न कर । शब्दाथ- देहुरै= मन्दिर मे । ल्यौ = ध्यान ।

                          ॥ २४. भेष को ऋप्रगङ ॥

"कर सेती माला ज़पै, हिरदै बहै डंडूल। पग तौ पाला मै गिल्या, भाज्र लागी सूल ॥१॥" सन्दर्भ-- सासारिक मनुष्य माया जाल मे फंसे रह्ते हे। भावार्थ-- हे जीवात्मा। तू हाथ से माला जप रहा है इस वात का प्रदर्शन कर रहा है कि मैं ईश्वर भक्त हूँ किन्तु मेरा ह्र्द्य माया जाल मे फ्ंसा हुआ है । विषय-वास्ना रपो पाले मे तेरे गल गये है अब यदि इससे भागने का भी प्रयास करेगा तो तेरे पैरो मे कांट चुभ जायगे । शब्दार्थ-- सेती = से। डडुल= माया जाल ।

"कर पकरै श्रॅगुरी गिनैं , मन घायै चहुॅ श्रोर । जाहि फिरांया हरि मिलै ,सो भया काठ की ठौर ॥२॥" सन्दर्भ-- ईश्वर की प्राप्ति सासारिक विष्य वासनाऔ से मन को अंलग कर देने मे होती है। भावार्थ--ढोगी साघक हाथ मे माला लेकर उंगलियो से उनकी मनकाओ को गिनता जाता है किन्तु मन जिसको स्थिरता से ही साघना सभ्भव है वह चारो ओर दौ़ड रहा है। जिस मन को संसार की ओर से घुमा देने पर अलग कर देने पर ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है वह मन तो काठ के समान जड़ हो गया है। शब्दार्थ--वोर=अोर । काठ की ठोर=काष्ठवत ।

"माला पहरैं मनसुषी, ताथैं कछू न होइ । मन माला कौं फेरता, जुग उजियारा सोइ ॥३॥" सन्दर्भ--मन को माला को फेरने से ही ईश्वर प्राप्ति सभव है।