पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२२७

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२१६]                       कबीर के साखी

भावार्थ्-मनुष्य माला को गले मे पहन कर उसे वर्थ ही घुमाता रहता है किन्तु उसका मन वहिमुला हो जाता है वह संसारिक विष्य वासगाऔ मे लिपता रहता है । इस प्रकर की पूजा से उपासना से कोई लाभ नही है।यदि वह मन की माला को सच्चे ह्रदय से फेरे तभी उसका यह लोक और परलोक दोनो सुधरेगा।

शब्दार्थ- मनसुषी = एक प्रकर की माला का नाम।
  माला पहरैं मनसुषी , बहुतैं फिरैं क्षचेत । 
  गागी रोलै बहि गया, हरि सूं नाहीं हेत ॥४॥
स्ंदर्भ-मन पवित्र होने से हो जप तप उपासनादि का फल प्राप्त होता है।
भावार्थ- इस संसार मे बहुत से व्यक्ति मनसुखो माला को पहने अचेता वस्था-अघाना वस्था मे घूमा करते हैं किन्तु जिस व्यक्ति का ईश्वर से सच्चा प्रेम नहीं हैं वह गंगा जैसी पवित्र नदी के पास भी जाकर स्नान नहीं कर पाता वरना उसके प्रवाह मे प्रवाहित हो जाता है।उसका कल्यान नहीं हो पाता है।
शब्दार्थ- अचेत=अज़ान । गागी =गंगा के। रोलै=धारा मे । हेत= प्रेम,भक्ति ।
  कबीर माला काठ की,कहि समझावे तोहि ।
  मन न फिरावे क्षापणा, कहा फिरावे मोहि॥५॥
संदर्भ-सच्ची भक्ति तो संसार से चित वुक्ति को हटाकर प्रभु के केन्द्रित करना है।
भावार्थ-काष्ठ की माला, माला घुमाने वाले साषक को समझाती हुई कहती है कि ऐ साघक!तू यदि अपने मन को परमाप्ता की और उप्मुख नही करता है तो फिर मुक्भे घुमाने से क्या लाभ? कबीर कहते है कि सच्ची उपासना तो मन को प्रभु की और लगाना ही हो ।

शब्दार्थ-आपरणा = अपना |
  कबीर माला मन की क्षोर संसारी भेष |
  माला पहेर्या हरि मिलै , तो क्षरहट कै गलि देष ॥६॥
संदर्भ-नही माला पहनने से ईश्वर की प्राप्ति होती है ? 
भावार्थ- कबीरदादस जी केहते है कि वास्विक माला तो मन की होनी चाहिए और मालाएं तो म दिखावा मात्र हैं। यदि माला के पहनने से ही प्रभु