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देता है। गाय घास खाकर अमृतोपम दूध देती है और इसको चाटकर सर्प भी बल प्राप्त करता है— उसके भी विष की वृध्दि होती है। अभिप्रेत अर्थ यह है कि दुष्ट जन अच्छी से अच्छी वात का दुरुपयोग करते है। अनेक प्रकार के उपायो द्वारा वासना को दमन करने पर भी विषयो के प्रति आसक्ति नि.शेष नहीं हो पाती है। जो साधु-वेष धारण करके भी दुष्टों की संगति करता है, उसके लिए क्या कहा जाए और क्या किया जाए? कबिरदास कहते हैं कि जो व्यक्ति भगवान राम मे पूर्ण रूप से अनुरक्त होते हैं, उन्ही का मोह भ्रम नष्ट होता है।
अलंकार — (१) सम्वन्धातिशयोक्ति— राम जाई।
(२) पदमैत्री— जस तस|
(३) दृष्टांत— कहता न जाई|
(४) विशेपोक्ति— अनेक जाई।
(५) रूपकातिशयोक्ति—अमृत, भवगम।
(६) सभग पद यमक— सन्त असन्त।
(७)गूढोक्ति— तासू बसाई।
विशेष— जैसी कहै अपारा।
तुलना कीजिए-
कर्म प्रधान विश्व कर राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।
तथा— परउपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।
(गोस्वामी तुलसीदास)
(२०१)
कथणीं बदणीं सब जंजाल,
भाव भगति अरू रांम निराल॥ टेक॥
कथै वदै सुणै सव कोई, कथे न होई कीयें होई।
कूडी करणी राम न पावै, साच टिकै निज रूप दिखावै॥
घट मे अग्नि घर जल अवास, चेति वुझाइ कबीरादास।
शब्दार्थ- कथणी==कहना, धर्मोपदेश। वदणी = देश सम्बन्धी आचरण अर्थात् वाहोपचार। कूडी= निकामी, व्यर्थ की। करणी=आचरण। बदै=विवाद, अवास =निवास स्थान। अग्नि =वासनाओ की अग्नि। जल=आनन्द रूपी जल।
संदर्भ-कबीरदास कहते हैं कि आत्म-ज्ञान के द्वारा ही कल्याण सम्भव है।
भावार्थ — धर्मोपदेश एवं वाह्योपचार सब व्यर्थ का झमेला है। भगवान राम का स्वरूप एवं उनके प्रति भक्ति भाव — ये दोनों अनोखी वस्तु हैं। धर्मोपदेश,विचार तथा भाव सब करते हैं,परंतु वास्तविक लाभ तो धर्माचरण से होता है,