(iii) मुद्रा—खेचरी मुद्रा। योग की अगभूत एक मुद्रा जिसमे जीभ उलट कर तालू में लगाई जानी है और दृष्टि त्रिकुटी पर स्थापित की जाती है।
(iv) मन मैं कहणा—तुलना कीजिए—
वाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा
विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्ययोग युक्तात्मा
खमक्षयमश्नुते।
स्पर्शान्कृत्वा बहिबहिमाश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रवो।
प्राणायानौ समैकृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।
पत्रोपरमते चित्त निरुद्धं योगसेवय।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनितुष्यति।
(श्रीमद्भगवद्गीता ५/२१, ५/२७, ६/२०)
भावुक कवि जन इसी अद्वैतावस्था का वर्णन काव्यात्मक शैलि में करते आए है—
राधिका, कान्ह को ध्यान धरै तब कान्ह ह्वै राधिका के गुन गावै।
ज्यों अँसुवा बरसे बरसाने को पाती लिखै लिखि राधिकै ध्यावै।
राधे ह्वै जावत है छिन में वह प्रेम की पाती लै छाती लगावै।
आपु में आपुन ही उरझै, सुरझै, बिरुझै, समुझै, समुझावै। —देव
(v) अनहद—देखें टिप्पणी पद स॰ १५७।
(vi) पच परिजारि भूका—इस पक्ति का अर्थ इस प्रकार भी किया जा सकता है कि जो योगी काम कोधादि पच विकारो को समाप्त करके शरीर की आवश्यकताओ से मुक्त हो जाता है वह द्वैत रुपी लंका पर विजय प्राप्त करता है।
(vii) लंका—ससार अथवा द्वैत भाव। 'रामचरित मानस' में गोस्वामी तुलसीदास ने लका का प्रयोग उस शरीर के लिए किया है, जिसमे 'अहकार' रूप रावण का निवास है। यथा—
सखा धरम मय अस रथ जाकें।
जीतन्ह कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।
स्पष्ट है कि गोस्वामीजी 'विप्क्षी भाव' से रहित हो जाने को ही शत्रु पर विजय मानते हैं।
(viii) ज्ञान के क्षेत्र में जो अद्वैत है, योग के क्षेत्र में वही समाधि है।
(ix) इस पद के अन्तर्गत डा॰ भगवतस्वरूप मिक्ष की टिप्पणी दृष्टव्य है।
"बाहरी उपकरणो मुद्रा, श्रृगी आदि को तत्त्व-प्राप्ति का मूलतः साधन मानने का खण्डन किया गया है। इनके मूल प्रतीकार्थो को ग्रहण करके इनको आभ्यतर साधनो के रूप में अपनाने का सदेंश दिया गया है। 'मुद्रा' निम्नलिखित