(२१०)
गोब्यन्दे तुम्हारै वन कन्दलि, मेरो मन अहेरा खेलै॥
बपु बाड़ी अनगु मृग, रचिही रचि मेलै॥ टेक॥
चित तरउवा पवन षेदा, सहज सूल बांधा।
ध्वांन धनक जोग करम , ग्यांन बांन सांधा॥
षट चक्र कंवल बेधा, जारि उजारा कीन्हां।
कांम क्रोध लोभ मोह, हाकि स्यावज दीन्हां॥
गगन मण्डल रोकि बारा, तहाँ दिवस न राती।
कहै कबीर छांडि चले, बिछुरे सब साथी॥
शब्दार्थ—कदलि=कदलि, केला। अहेरा=शिकार। बपु=शरीर। बाड़ी=बाटीका। अनग=मृग। तरउवा=साथ लगे रहने वाला, पदाति।खेदा=खदेड़ने वाला, श्वापदो को आखेट-स्थल की ओर भगाकर ले जाने वाला। मूल=मूलाघार चक्र। ध्वान=ध्यान। धनक=धनुष। स्यावज=सावज, शिकार।
सन्दर्भ—कबीर शिकार के साथ रूपक बाँधते हुए कायायोग की साधना का वर्णन करते हैं।
भावार्थ—हे गोविन्द! तुम्हारे इस कदली वन में अर्थात् जगत् में मेरा साधक मन रूपी शिकारी शिकार खेल रहा है। इस शरीर रूपी बाटिका में काम-देव रूपी पशु पर यह साधक मन ताक-ताक कर बाण चलाता है। इस शिकार में चित्त रूपी तरउवा पवन रूपी खेदा की सहायता से पशुओ को खदेड कर एक स्थान पर बाँध देता है। भावार्थ यह है कि चित्त की चेतना ही वह पदाति है जो इस वन से भली भाँति परिचित है। वह इस साधक मत का मार्ग-दर्शन करता है। प्राणायाम की पवन ने इन विकाररूपी पशुओ को खदेड कर एव एक स्थान पर एकत्र करके उन्हें सहज स्वरुप की जह से बाँध दिया है। इस शिकार के लिए साधक ने ध्यान रूपी धनुष लेकर योग-रूपी कर्म से ग्यान रूपी वाण का सधान किया है अर्थात् लक्ष्य-भेद (विकार-शून्य सहज अवस्था की प्राप्ति) के प्रति उसको साधा है। इस साधक शिकारी ने कुण्डली जगा कर षटकमल चक्रो को भेदन कर लिया है ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करके प्रकाश कर दिया है। काम क्रोध लोभ मोह रूपी जानवरो का हाँका कर दिया गया है अर्थात् उनका शिकार कर दिया गया है। गगनमण्डल को रोककर शिकार का यह वाडा बनाया गया है। वहाँ न दिन है, न रात है। समाघिस्थ होने पर साघक को दिनरात का ज्ञान नहीं रहता है। दूसरी ओर शिकार करते समय दिनरात का विचार नही रह जाता है। कबीर कहते है कि साधक मन अब अद्वैतावस्था को प्राप्त हो गया है और उसके समस्त विकार रूपी साथी छूट गए है। इस पद का अर्थ अन्य प्रकार भी किया जा सकता है। इस शिकार मे अर्थात् उस सहज अवस्था की प्राप्ति में अन्य साधनाओ तथा कर्मो में रत अन्य साधक बिछुड गए हैं अर्थात् वे उस अवस्था