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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१४

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ग्रन्थावली
 
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दस दल होते हैं। यह नील वर्ण का होता है। इसका लोक 'स्व' है। इसका ध्यान करने से क्रमशः ड, ढ, ण, त, th, द, ध, न, प, फ, की ध्वनियाँ झंकृत होती हैं। इसके सिद्ध लाभ होने से मनुष्य संहार पालन मे समर्थ तथा वचन-रचना मे समर्थ हो जाता है, और उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है।
      (iv) अनाहत चक्र——इसका स्थिति-स्थान हृदय मे होता है। इसमें बारह दल होते हैं। यह अरुण वर्ण का होता है। इसका लोक 'मह' है। इसका ध्यान करने से एक प्रकार का अनहद नाद झंकृत होता है। वह क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ का होता है। इसके सिद्ध लाभ होने मे मनुष्य वचन रचना मे समर्थ, ईशित्व सिद्धि प्राप्त योगेश्वर, ज्ञानवान, इन्द्रियजित्, शक्ति सम्पन्न हो जाता है।
      (v) विशुद्ध चक्र——यह चक्र कण्ठ-स्थान मे स्थित होता है। इसके सोलह दल होते हैं। यह धूम्र वर्ण का होता है। इसका लोक 'जन' है। इसका ध्यान करने से क्रमशः अ से लेकर अः तक सोलह स्वरों की अनहद ध्वनि झंकृत होती है। ध्यान सिद्ध होने पर मनुष्य काव्य-रचना मे समर्थ, ज्ञानवान्, उत्तम वक्ता, शुद्ध चित्त, त्रिलोकदर्शी, सर्वहितकारी, नीरोग, चिरजीवी और तेजस्वी होता है।
      (vi) आज्ञा चक्र——इसका स्थिति-स्थान दोनों भ्रुवों के मध्य है। इसमें दो दल होते हैं। यह श्वेतवर्ण होता है। इसका लोक तप है। इसका ध्यान करने से ह, क्ष का अनहद नाद क्रमशः ध्वनित होता है। इसके सिद्ध लाभ से योगी को वाक्य सिद्धि प्राप्त होती है।

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साँचा:Poem

सन्दर्भ——कबीर कहते हैं कि साधना और गुर की कृपा के द्वारा स्वरूप की प्राप्ति होती है।
भावार्थ——भगवान से यही प्रार्थना है कि वह साधन-चाम शरीर रूपी कचुकी को आत्मा से विलग न करे। जो जन्म-मरण के भय से मुक्त है, वही मेरे इस पद के वास्तविक अर्थ को समझ सकता है, (क्योंकि प्रभु की प्राप्ति अनेक साधना के फलस्वरूप प्राप्त होती है तथा साधना के लिए 'साधन धाम'