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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१७

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के समय मेरे पास स्वानुभूति रूपी बेल मात्र है, उसके विक्षेप रूपी पत्ते नष्ट हो चुके हैं।
          अलंकार——(i) सांग रूपक——सम्पूर्ण पद।
                      (ii) विरोधाभास——जीवन ॰॰॰॰॰॰ 'कता, मार्या ॰॰॰॰॰॰ राख्‍या, बेलि ॰॰॰ पात नही।
                      (iii) विभावना की व्यंजना——उर बिन ॰॰॰॰ ॰॰॰ सोई, मृग के सीस नही रे, धुनही पिनच नही रे।
                      (iv) अनुप्रास——तृतीय पंक्ति, व की आवृत्ति।
          विशेष——(i) वैराग्य की कुछ साधनाओं मे मन को कुचल कर विषयों से असम्पृक्त करना न उचित है और न सम्भव ही है। कबीरदास ने इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य का प्रतिपादन किया है। उनका कहना है कि भावनाओं का उन्नयन करके विषयों को भक्तिमय बना देना ही काम्य है।
                      (ii) उर बिन ॰॰॰ विहूना——मन का हृदय उसकी सरसता है, 'खुर' आदि से व्यंजित आकार भी संकल्प-विकल्प एवं वासना रूप ही हैं। वे सब इस कृच्छ साधना से छिप गए हैं। ऐसे पशु का शिकार ही क्या करना, क्योंकि विषयों से वंचित की गई इन्द्रियाँ मृतवत् प्रतीत होती हैं।
                      (iii) रगत न मारा——उस साधना मे तल्लीन मत होओ जिसमें केवल ज्ञान-वैराग्य की शुष्कता है और प्रेम भक्ति के रस का अभाव है। इन पंक्तियों में कबीर का भावुक भक्त उभर आया है।
                      (iv) ता बेल को ॰॰॰ ली——विक्षेपरहित माया पर साधक मन का अधिकार होगया है—उसको वह देख भर रहा है।
                      (v) तुम्हरे मिलन ॰॰॰ पात नही रे——अब मेरी मनस्थिति विक्षेपरहित है। पत्ते रहने पर बेन के वृक्ष को परिवेष्टित करने मे कुछ व्यवधान रहता है, परन्तु पत्तों के अभाव मे बेल पूरी तरह से वृक्ष से लिपट सकती है। अतएव विक्षेप रहित जीवात्मा अपने साध्य प्रियतम से पूर्णतया आबद्ध (एकाकार) होने की स्थिति को प्राप्त होगई है। मायारहित जीव अपने पति परमेश्वर मे पूर्णत तदाकार होने को प्रस्तुत है।
                      (vi) इन पंक्तियों में सूफियों के रहस्यवाद की व्यंजना है। भक्तजन भी बाह्यसाधनरहित होकर ही प्रभु-मिलन को काम्य मानते हैं। ब्रज की गोपियों ने भी कृष्ण को तभी प्राप्त किया था, जब उन्होंने पूर्ण शरणावस्था को सहर्ष स्वीकार कर लिया था। द्रौपदी के रक्षार्थ कृष्ण तभी आए थे जब उसने अपनी धोती की गाँठ का ध्यान छोड़कर दोनों हाथ ऊँचे करके मुरारी को पुकारा था। अहंकाररहित मर्मज्ञ मन ही इस अनुभूति का क्षेत्र है।
                      (vii) कबीरदास ने इन पंक्तियों में वासना से (हठयोगी साधना) का ॰॰॰॰ ॰॰॰ और मोक्षरूपी फल प्राप्ति की प्रेरणा दी है।