(viii) भाव साम्य के लिए देखे—
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।
(श्रीमद्भगवद्गीता २/५९)
(२१३)
धीरौ मेरे मनवां तोहि धरि टांगौं,
तै तौ कियौ मेरे खसम सूं षांगौं॥ टेक॥
प्रम की जेवरिया तेरे गलि बांधूं, तहां लै जांउं, तहां मेरौ माधौ॥
काया नगरी पैसि किया मै बासा, हरि रस छाड़ि विषै रसि माता॥
कहै कबीर तन मन का ओरा, भाव भगति हरि सूं गठजोरा॥
शब्दार्थ—खागौं—खोट, बुराई। जेवरिया=रस्सी। माता=मत्त, लिप्त। गठ-जोरा=ग्रथि-बधन, विवाह।
संदर्भ—साधक कबीर ज्ञान की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं।
भवार्थ—कबीर कहते हैं कि रे मेरे विषयी मन, तू जरा धैर्य धारण कर अथवा तू जरा ठहर जा। मैं तुझको अभी पकड कर टाँगता हूँ अर्थात् दण्डित करता हू। 'घरि टागौ' का अर्थ 'उलटा टाँगना' भी हो सकता है। तब इसका अर्थ इस प्रकार होगा कि मैं तुझे विषयाभिमुख न रहने देकर आत्माभिमुख करता हूँ। तुमने मेरे पति भगवान के साथ खोटाई (बुराई) की है।
मै तेरे गले में भगवद्प्रेम की रस्सी डालू गा और बाँधकर तुझे वहाँ ले जाऊगा जहाँ मेरे माधव हैं।
मन उत्तर देता है कि मैंने इस कायारूपी नगरी में प्रविष्ट होकर भक्ति रस को छोड दिया था, और मैं विषय-रस में लिप्त होकर अपने आपको भूल गया था। पर अब मैने तन-मन भगवान को अर्पित कर दिए है और मेरी भाव भक्ति का गठबन्धन भगवान से होगया है।
- अलंकार—(i) छेकानुप्रास—धीरौ घरि भाव भगति, मेरो माधौ।
- (ii) रूपक–प्रेम की जेबरिया, काया नगरी हरिरस।
- (iii) पदमैत्री—तन मन।
विशेष—(i) मन का मानवीकरण।
(ii) खसम—सत सम्प्रदाय का प्रतीक है। दाम्पत्य भाव के आवरण में भक्ति-भावना की व्यजना है। यह सूफियों का प्रभाव है।
(iii) भाव साम्य देखे—
अबलौं नसानी, अब न नसैहौं।
राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागें पुनि न डसैहौं।
परबस जानि हँस्यौ इन इन्द्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं।