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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३२७

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६४२ ]                                                                            [ कबीर
भी प्रकार के बाह्याचार द्वारा उसके रूप का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता है। कबीरदास कहते हैं कि फिर वह तीनों लोकों से परे है। वह परम तत्त्व ऐसा अनोखा है।
          अलंकार——(i) भवनातिशयोक्ति——मरम न जानै कोई।
                      (ii) पुनरुक्तिप्रकाश——घट-घट।
                      (iii) पदमैत्री——विबर्जित की पुनरावृत्ति।

( २२१ )

      रांम रांम रांम रमि रहिये, साषित सेती भूलि न कहिये ॥ टेक ॥ का सुनहां कौं सुमृत सुनाये, का साषित पै हरि गुन गांये । का कऊवा कौं कपूर खवांये, का बिसहर कौं दूध पिलांये ॥ साषित सुनहां दोऊ भाई, बो नीदै वौ भौंकत जाई । अंमृत ले ले नींब स्यंचाई, कहै कबीर वाकी बांनि न जाई ॥

सन्दर्भ——कबीरदास शाक्तों के प्रति अपना विरोध प्रकट करते हैं।
भावार्थ——राम मे मन, वचन, कर्म से (सब प्रकार) रमे रहो परन्तु भूलकर भी राम नाम की चर्चा शाक्त से मत करो। वह इसका पात्र नहीं है, उससे राम नाम की चर्चा करना व्यर्थ है। जैसे कुत्ते को धर्मशास्त्र सुनाने से क्या लाभ है, वैसे ही उस ज्ञानहीन के समक्ष हरिगुण-गान का क्या उपयोग हो सकता है ? कौए को कपूर खिलाने से तथा सर्प को दूध पिलाने से क्या लाभ है ? शाक्त और कुत्ता दोनों भाई हैं। शाक्त सदैव भगवान के भक्तों की निन्दा करता है और कुत्ता सदैव दूसरों पर भौंकता रहता है। कबीर कहते हैं कि नीम के वृक्ष को चाहे अमृत से सींचा जाए, परन्तु वह अपनी स्वाभाविक कड़वाहट नहीं छोड़ता है।
          अलंकार——(i) पुनरुक्तिप्रकाश——राम राम राम, ले-ले।
                      (ii) अनुप्रास——राम राम रमि, सुनहा, सुमृत साषित।
                      (iii) भ्रम——साषित सुनहा ॰॰॰ नीदै भौंकत।
                      (iv) उदाहरण——का साषित ॰॰॰ गांये।
                      (v) दृष्टान्त——का कऊआ ॰॰॰ पिलांये।
                      (vi) वक्रोक्ति——का सुनहां ॰॰॰ पिलांये।
                      (vii) विशेषोक्ति——अमृत ले ॰॰॰ न जाई।
          विशेष——(i) अमृत से सींचे जाने पर भी इस पंक्ति में लोक प्रचलित ढंग से भक्ति की महिमा रूप में प्रयुक्त किया गया है।
                      (ii) जाकै हरी सुभाव नाहिं जाई। नीम न मीठ होइ सींचि गुड़ घी सौं।