गढ लिया है। गर्दन नापने का अर्थ होता है—प्राण लेने की तैयारी। 'शरीर नापना' भी इसी अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। भाव यह है कि शरीर क्षीण होते देखकर काल उसको नष्ट करने की योजना बनाता रहता है अर्थात् ज्यो-ज्यो शरीर क्षीण होता जाता है। त्यो-त्यो अन्त काल निकट आता जाता है।
(iv) विषय के बन्धन जर्जर होने के कारण यद्यपि सहज ही तोडे जा सकते हैं तथापि वे शरीर के लिए बहुत कष्टकारी होते हैं और जीवात्मा उनमे फँसा रहता है। यही विरोधाभास है।
(v) शरीरान्त होने पर स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है। अतएव समस्त इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी होती हैं। कर्म का हिसाब जीवात्मा को देना पडता है। काम-मनस को अपने कर्मफल को पूरा करना पडता है। पिछले कृत्यों के परिणाम सामने आने पर काम-मनस को अपार कष्ट होता है, क्योकि उसकी इच्छाशक्ति बनी रहती है। काम-मनस की यह विवशता ही प्रेतयोनि, नरक-निवास आदि नामो से अभिहित की जाती है।
(vi) समभाव के लिए सूरदास का यह पद देखें—
अवकी माधव मोहि उधारो।
मगन हौं भव अम्बुनिधि में कृपासिंधु मुरारी।
नीर अति गम्भीर माया लोभ लहरि तरंग।
लिए जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंत।
मीन इन्द्रिय अतिहि काटत कोट अघ सिर भार।
पग न इत-तन धरन पावत उरझि मोह सेवार।
काम क्रोध समेत तृष्णा पवन अति झकझोर।
नहिं चितवन देत तिय सुत नाम नौका ओर।
थक्यो बीच बेहाल विह्वल पुनहु करुना मूल।
स्याम भुज गहि काढि डारहु 'सूर' ब्रज के कूल।
अन्य भक्तो ने भी इस जन्म की दारुण व्यथा का वर्णन करते हुए प्रभु से उद्धार करने की कामना प्रकट की है।
(२२३)
ता भै थै मन लागौ रांम तोही,
करौ कृपा जिनि बिसरौ मोही॥ टक॥
जननीं जठर सह्या दुख भारी, सो सक्या नहीं गई हमारी।
दिन दिन तन छीजै जरा जनावै, केस गहें काल बिरदग बजावै॥
कहै कबीर करुणांमय आगै, तुम्हारी क्रिया बिना यहु बिपति न भागै।
शब्दार्थ—भै=भय। जठर=उदर, पेट। छीजै=नष्ट हो जाता है। जरा=वृद्धावस्था। बिरदग=मृदग।
सन्दर्भ—कबीर भगवान से उद्धार की प्रार्थना करते हैं।