सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३३६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
ग्रन्थावली]
[६५१
 


(v) खाने वाली डाकिनी जीवात्मा है। यह मायाजन्य समस्त परिवार को समाप्त करती है। विभिन्न सम्बन्धियो को खाने के बाद योग की प्राप्ति होती है। इसका आशय यह है कि ससार के जितने भी सम्बन्ध हैं जब तक उन्हे समाप्त करके एक मात्र स्वामी (हरि) में चित्त को लगा कर उनका स्मरण नहीं किया जाता है, तब तक उनसे संयोग नहीं होता है।

(vi) इस पद में यह भी ध्वनित है कि सासारिक सम्बन्धो से विमुख होकर ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है। ठीक ही है। दो घोडो की सवारी असम्भव है। उस दुनियाँ में जाने के लिए इस दुनियाँ को छोडना ही पडेगा।

(vii) तीन बार 'राम' शब्द कहने का अभिप्राय यह है कि मनसा, वाचा कर्मणा 'राम' के प्रति प्रकृति एव अनुरक्ति होनी चाहिए।

(२२८)

मन मेरौ रहटा रसनां पुरइया,
हरि कौ नांउ लै लै काति बहुरिया। टेक॥
चारि खूंटी दोइ चमरख लाई, सहजि रहटवा दियौ चलाई।
सासू कहै काति बहू ऐसै, बिन कातै निसतरिबौ कैसे॥
कहै कबीर सूत मल काता, रहटां नहीं परम पद दाता।

शब्दार्थ—रहटा=चरखा। रसना=जीभ। पुरइया=सूत पूरने वाली तकुली। चार खूँटी=अन्तःकरण। चतुष्टय=मन, बुद्धि, चित्त अहकार। चमरख=चर्म के टुकडे जिनमे से होकर तकुआ घूमता है। यहाँ तात्पर्य है प्रवृत्ति एव निवृत्ति मार्ग।

संदर्भ—कबीर अपनी आत्मा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि वह तू प्रभु का नाम ले लेकर प्रभु-प्रभु का सूत कात।

भावार्थ—मेरा मन ही चरखा है और जीभ ही सूत पूरने वाली तकुली है। हे आत्मा रूपी बहू तू राम का नाम लेती हुई इस चरखे के द्वारा भक्तिमय जीवन सूत कात। मन, बुद्धि, चित्त एव अहकार ही इस चरखे की चार खुँटियाँ हैं तथा प्रवृत्ति एव निवृत्ति मार्ग वे चमडे के टुकडे हैं जिनमे होकर यह चरखा घूमता है। इस चरखे को सहज समाधि के मार्ग पर चलादो। भाव यह है कि साधक जीभ से राम का नाम ले, अन्तःकरण चतुष्टय को प्रवृत्ति एव निवृत्ति मार्ग के मध्य समन्वित करदे और सहज समाधि प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो जाए।

गुरु रूप सास साधक जीव रूप बहू को चेतावनी दे रही है कि इस चरखे रूपी मन से भक्ति रूपी सूत कात अन्यथा जीवन का निस्तार नहीं है अर्थात् बिना ऐसा किए हुए जीवन सफल नहीं होगा। कबीरदास कहते हैं कि यदि इस जीवन रूपी चरखे से भक्ति रूप सूत भली प्रकार काता जाए, तो यह जीवन रूपी चरखा केवल भक्ति रूपी सूत कातने का साघन ही न होकर मोक्ष प्रदान करने का माध्यम बन जाएगा।