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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३४०

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ग्रन्थावली]
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अपने प्रियतम की प्यारी हो पाऊगी। अर्थात् तब मेरे समस्त अज्ञान नष्ट हो जायेगे। मैंने खूब सोच-विचार करके देख लिया है कि अब इस संसार से छुटकारा पाने का अवसर आ गया है। कबीर कहते हैं कि हे मेरी बुद्धि रूपी सुन्दरी, अब तुम स्वामी राम के साथ रमण करो।

अलंकार—(i) रूपकातिशयोक्ति अलकार—अनेक प्रतीकात्मक उपमानो का प्रयोग है।
(ii) विशेषोक्ति की व्यजना—सेजै देखौं।
(iii) विरोधाभास—बाप लराई।
(iv) पदमैत्री—सहेली, गहेली।
(v) अनुप्रास—माया मद मतवाली।

विशेष—(i) सेजै रहूँ देखौं— ईश्वर और जीव का शाश्वत अभेद है। यह फिर भी अज्ञान द्वारा आवृत्त हो जाने के कारण जीव ईश्वर से विलग सा बना रहता है। अज्ञान के कारण ही जीवात्मा प्रभु का साक्षात्कार नही कर पाता है और दुखी बना रहता है—

ईस्वर अस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।
सो मायावस भयउ गोसाईं। बँध्यौ करि मरकट की नाईं।
तब ते जीब भयउ संसारी। छूट न ग्रथि न होइ सुखारी।

(गोस्वामी तुलसीदास)

(ii) अन्तिम पक्ति का अर्थ एक अन्य प्रकार भी किया जा सकता है। आत्मा या विवेक रूपी सुन्दरी अपने आपको सम्बोधन करके कहती है कि, 'रे सुन्दरी अब तुम विषयाशक्ति का कुपरिणाम देख चुकी। अब तुम भगवान राम के साथ रमण करो।'

(iii)दाम्पत्य भाव का आवरण इस विरह-वेदना का विम्ब-विधायक बन गया है।

(iv)यहाँ अर्द्ध प्रबुद्ध जीवात्मा द्वारा अपनी वृद्ध अवस्था एवं मुक्त होने की विकलता का मर्मस्पर्शी एव सागोपाग वर्णन कराया गया है।

(v) यह पद उलटबाँसी जैसा है। अन्तिम पक्ति में पद की कुँजी मिल जाती है। पहले चरण में मति (बुद्धि) की शिकायत है और अत में उसी को सही दिशा में उन्मुख किया गया है।

(ix)तुलना करें—

एकहि पलग पर कान्ह रे, मोर लख दूर देस मान रे।

(विद्यापति)

(२३१)

अवधू ऐसा ग्यांन बिचारी,
ताथै भई पुरिष थै नारी॥ टेक॥