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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३४८

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ग्रन्थावली]
[६६३
 

सो अनन्य गति जाके मति न टरह अनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।

(रामचरितमानस)

(iii) जानि न ढारै पासा—जगत के प्रति सेवा का भाव होने के कारण विरोध-भावना अथवा द्वैत भाव स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं। धर्मशील एव सच्चे भक्त का लक्षण हो यह है कि विपक्षी की भावना निर्मूल हो जाए और सब आत्मीय प्रतीत होने लगे—

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहें न कतहुँ रिपु ताके।
महा अजय ससार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाके अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मति घीर।

(रामचरितमानस, तुलसी)

इसी से कबीर ने कहा है कि जीतता वही है जो किसी को हराने का प्रयत्न नही करता है।

(२३६)

लावै बाबा आणि जलावौ घरा रे,
ता कारनि मन धंधै परा रे॥ टेक॥
इक डांइनि मेरे मन मै बसै रे, नित उठि मेरे जीव को डसै रे।
या डांइन्य के लरिका पांच रे, निस दिन मोहि नचाँवे नाच रे॥
कहै कबीर हूं ताकौ दास, डांइनि के सगि रहै उदास।

शब्दार्थ—लाबौ=लाओ। घराने=घर, काम मनस ससार। धधै=झझट, बन्धन। डाइन=चुडौल। डसै=डसती है, काटती है। पाँच लडके=काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर। नाच नचाना=परेशान करना।

संदर्भ—कबीर विषयासक्ति से विरत होने का उपदेश देते हैं।

भावार्थ —हे बाबा! मुझे ज्ञान की अग्नि ला दो, जिससे मैं विषय-वासनाओ के घर काम-मनस (Mindelity) को जलाकर भस्म करदूँ। इसके कारण ही यह मन अनेक झझटो (बन्धनो) मे पडा हुआ है। आसक्ति रूपी चुडैल मेरे मन मे घुस कर बैठ गई है। वह नित्य प्रति अपना सिर उठा कर मेरे अन्त करण को काटती-कचोटती है। इस चुडैल के काम क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर-नामक पाँच लडके हैं, जो मुझे दिन-रात तरह-तरह से परेशान करते रहते हैं। कबीर कहते हैं कि मैं उस व्यक्ति का दास हूँ अथवा उस व्यक्ति को अपना गुरु बनाने को तैय्यार हूँ जो इस आसक्ति-रूपी चडैल की ओर न तो ध्यान देता हूँ और न उससे प्रभावित्त ही होता हूँ।

अलकार—(i) रूपकातिशयोक्ति—आगि, घर, डायनि, लरिका पच।

विशेष—(i) मुहावरा—नाच नचाना।

(ii)आसक्ति पर विजय अत्यन्त कठिन है।