- (iii)लोकोक्ति—अपण पाव आप मारना।
- (iv) रूपकातिशयोक्ति—पोट।
विशेष—मुहावरो का प्रयोग—हावडि धावडि, अगुली पर गिनना।
उद्धार के लिए सत्कर्म आवश्यक है। भगवान भी उन्ही का उद्धार करते हैं जो स्वय अपने उद्धार मे प्रयत्नशील होते हैं "God helps those who help themselves
(२४०)
प्रांणी काहे कै लोभ लागि, रतन जनम खोयौ।
बहुरि हीरा हाथि न आवै, रांम बिनां रोयौ॥ टेक॥
जल बूंद थै ज्यनि प्यड बाध्या, अगिन कुंड रहाया।
दस मास माता उदरि राख्या, बहुरि लागी माया॥
एक पल जीवन की आशा नांही, जम निहारे सासा।
बाजीगर ससार कबीरा जांनि ढारौ पासा॥
शब्दार्थ— काहे कै=किसके। बहूरि=फिर। हीरा=हीरा रूपी मानव। जीवन। प्यड=शरीर। बाध्या=तैय्यार किया। अगिन कुड=गर्भ। जानि=सोच समझकर। ढारौ पासा=आचरण करो।
संदर्भ—कबीर कहते हैं कि विवेकपूर्ण आचरण ही जीवन का सर्वस्व है।
भावार्थ— हे प्राणी! तूने किस लोभ के वशीभूत होकर रत्नरूपी जीवन नष्ट कर दिया। हीरा रूपी यह मानव जीवन फिर दुबारा प्राप्त नही होगा। राम की भक्ति न करने के कारण अब केवल पश्चाताप ही तुम्हारे हाथ रह गया है। भगवान ने वीर्य और रज की बूँद से तुम्हारा शरीर उत्पन्न किया और उसको गर्भ की अग्नि मे सुरक्षित रखा। दस महीने तक भगवान माता के पेट मे उस गर्भ की रक्षा करते रहे। परन्तु तुमने उन भगवान का ध्यान तो किया नही, और जन्म लेते ही माया मे लिप्त हो गए। तुमने यह विचार नही किया कि इस जीवन का पलभर भी भरोसा नही है। इसको ले जाने के लिए यम एक-एक श्वास गिनता रहता है, अर्थात् यमराज सदैव यह देखते रहते हैं कि कब श्वासें पूरी हो और मै इस जीव को लेजाऊँ। कबीर कहते हैं कि यह ससार बाजीगर की तरह धोखा देने वाला है। इसमे विवेक पूर्वक आचरण करना चाहिए।
- अलकार—(i)रूपक—रतन जनम।
- (ii) रूपकातिशयोक्ति—हीरा, अगिन कुड।
- (iii) उपमा—बाजीगर ससार।
विशेष—(i) मुहावरो का प्रयोग—हाथ आना, पासा ढारना।
(ii) गर्भवास के कष्ट तथा ससार की असारता का वर्णन करके कबीर भय-दर्शन द्वारा जीव को सदाचरण की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
(iii) वैराग्य एव निर्वेद की व्यजना है।