सन्दर्भ—कबीर कहते हैं कि माया द्वारा मोहित मनुष्य को समझ लेना चाहिये कि एक मात्र राम-भजन द्वारा ही उसका उद्वार सम्भव है।
भावार्थ—जीव कहता है कि मैंने मुग्ध हो-होकर माया से प्रेम किया। इसी कारण उसने मेरा ज्ञान (आत्म-बोध) एव विवेक (ईश्वर का ध्यान) हरण कर लिया। यह संसार ऐसा अस्थायी है जैसा स्वप्न होता है और यह जीवन स्वप्न की भाँति मिथ्या है। परन्तु फिर भी मैंने परम निधान (सबके आश्रय) प्रभु को छोडकर ससार को सच्चा समझकर गाँठ मे बाँधा अर्थात् सासारिकता के प्रति आसक्त हुआ। पतिंगा नेत्रो की वासना की तृप्ति के फलस्वरूप पतगा प्रसन्न होता है और इस विषय-सुख के कारण वह पशु उनकी ओर जाते समय यह नही देखता है कि अग्नि उसको जला देगी। हे मूर्ख जीव! तू जो काल-पाश में बाधा गया है, वह कनक और कामिनी के प्रति आसक्त होने के कारण वाघा गया है। कबीर कहते हैं कि तू विचार करके काम, क्रोध, लोभ, मोह, मदादि विकारो को छोड दे और रघुनाथजी का भजन कर। वही ससार से तारने वाले हैं-नाव भी हैं और तारने वाले भी हैं। इस जगत मे अन्य कोई ऐसा नही है जिसका आश्रय ग्रहण किया जा सके।
- अलंकार—(i)उपमा—ससार सुपिन ऐसा, जीवन सुपन समान।
- पुनरुक्ति प्रकाश—मोहि मोहि।
- (iii) रूपक—काल-पाशि।
- (iv) उदाहरण—नैह नेह लागि।
- (v) छेकानुप्रास—नैह नेह, तिरण तारण।
- (vi) अनन्वय की व्यजना—दूजा नाही कोइ।
- (vii) वृत्यानुप्रास—माया मोहि मोहि, पतग पसू पेखै।
- (viii) पदमैत्री—सुपिन जीवन, करि विचार बिकार।
विशेष—(i) निर्वेद एव वैराग्य का प्रतिपादन है।
(ii) कबीर एक ज्ञानी भक्त की भाँति भगवद्भजन का उपदेश देते हैं।
(२४६)
ऐसा तेरा झूठा मीठा लागा,
ताथै साचे मना भागा॥ टेक॥
झूठे के घरि झूठा आया, झूठा खांन पकाया।
झूठी सहन क झूठा गाह्या, झूठे झूठा खाया।
झूठा ऊठण झूठा बैठण, झूठी सबै सगाई।
झूठे के घरि झूठा राता, साचे को न पत्याई॥
कहै कबीर अलह का पगुरा, साचे सू मन लावौ।
झूठे केरी सगति त्यागौ, मन बछित फल पावौ॥
शब्दार्थ—सहन=सहनक=थाली। वाह्या=किया। पगुरा=बच्चा।