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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३८४

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ग्रन्थावली]
[६९९
 

ब्रह्मा एक जिनि सिष्टि उपाई, नांव कुलाल धराया।
बहु बिधि भांडै उनहों घड़िया, प्रभू का अन्त न पावा॥
तरबर एक नांनां बिधि फलिया, ताकै मूल न साखा।
भौजलि भूलि रह्या रे प्रांणीं, सौ फल कदे न चाखा॥
कहै कबीर गुर बचन हेत करि, और न दुनियां आथी।
माटी का तन मांटी मिलि है, सबद गुरु का साथी॥

शब्दार्थ—कुलाल=कुम्हार। भांडै=वर्त्तन। घडिये=गढ़े, बनाए। भौजलि=भव-जल, ससार-रूपी जल। कदे=कभी। आधी=अस्तित्व वाली।

संदर्भ—कबीर ससार की निरर्थकता तथा गुरु की महिमा का प्रतिपादन करते हैं।

भावार्थ—हे राम-ऐसा वैरागी बहुत कठिनाई से मिलता है जो विषयो को छोडकर भगवान के भजन मे मग्न रहे। एक ब्रह्मा हुए जिन्होने सृष्टि उत्पन्न की और अपने आपको कुम्हार कहलवाया। उन्होने अनेक शरीर रूपी बर्त्तनो को बनाया, परन्तु वह भी भगवान के वास्तविक स्वरूप को नही जान सके। ससार-रूपी एक वृक्ष मे अनेक प्रकार की विषय-वासनाओ के फल लगे हैं। इस वृक्ष की न जड है और न उसके शाखाएँ ही हैं। यह प्राणी ससार के इन फल रूपी विषयो की मृग तृष्णा के जल मे अपने वास्तविक स्वरूप एव वास्तविक लक्ष्य को भूला हुआ है। विषय रूपी ये फल उसको खाने के लिए कभी नही प्राप्त होते है अर्थात् वह विषयो के द्वारा सच्चे सुख की प्राप्ति कभी नही कर पाता है। कबीरदास कहते हैं कि गुरु के वचनो पर विश्वास करो। शेष ससार अस्तित्वहीन (मिथ्या) है। मिट्टी का यह शरीर मिट्टी मे ही मिल जाएगा। केवल गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही हमारा सच्चा साथी है।

अलंकार—(i) वक्रोक्ति—को ऐसा वैरागी।
(ii) रूपकातिशयोक्ति—कुलाल, भाडे, तरवर।
(iii) निदर्शना—भौजल चाखा।
(iv) विभावना—तरवर एक साखा।
(v) रूपक—भोजल।

विशेष—(i) निर्वेद सचारी भाव की व्यजना है।

(ii) तुलना कीजिए—

जग देखन तुम पेखन हारे। विधि हरि सभु नचावन बारे।
तेउ न जानइ मर्म तुम्हारा। और तुम्हे को जाननि हारा।

(२६६)

नैक निहारि हो माया बीनती करै,'
दीन बचत बोले कर जोरे, फुनि फुनि पाइ परै॥ टेक॥