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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३८६

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ग्रन्थावली]
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(iii) माया बीनती करै—समभाव के लिए देखें—

भागती फिरती थी दुनिया जब तलब करते थे हम।
अब जो नफरत हमने की, वह खुद वखुद आने को है।

(iv) आठ सिद्धियाँ—योग सिद्धि से मिलने वाली आठ सिद्धियाँ या अलौकिक शक्तियाँ—अणिमा, महिमा, गरिमा, लछिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व।

(v) नौ निधियाँ—कुबेर की नौ निधियाँ—पद्म, महापद्म, शख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, ओर खर्व।

(vi) कबीरदास माया के प्रति सदा सावधान रहने का उपदेश बराबर देते आए हैं। यथा—

सुवटा! डरपत रहु मेरे भाई।

×××

या मजारी मुगध न मानै, सब दुनियाँ डहकायी।

×××

कहत कबीर, सुनहु रे सुवटा! डबरै हरि-सरनाई।

वीर ऐसे स्थलो पर ज्ञानी भक्त के रूप में उभर कर एकदम सामने आ जाते हैं।

(२७०)

तुम्ह घरि जाहु हंमारी बहनां,
बिष लागै तुम्हारे नैनां॥ टेक॥
अजन छाडि निरजन राते, नां किसही का दैनां।
बलि जांउ ताकी जिनि तुम्ह पठई, एक माइ एक बहनां॥
राती खांडी देख कबीरा, देखि हमारा सिंगारौ।
सरग लोक थै हम चलि आई, करन कबीर भरतारौ॥
सर्ग लोक मै क्या दुख पडिया, तुम्ह आई कलि मांही।
जाति जुलाहा नाम कबीरा, अजहू पतीजौ नांही॥
तहां जाहु जहां पाट पटबर, अगर चंदन घमि लीनां।
आइ हमारे कहा करौगी, हम तौ जाति कमींनां॥
जिनि हम साजे साज्य निवाजे, बांधे काचै धागै।
जे तुम्ह जतन करौ बहुतेरा, पांणीं, आगि न लागै॥
साहिब मेरा लेखा मांगै, लेखा क्यूं करि दीजै।
जे तुम्ह जतन करौ बहुतेरा, तौ पांहण नीर न भीजै।
जाकी मै मछी सो मेरा मछा, सो मेरा रखवालू।
टुक एक तुम्हारै हाथ लगाऊं, तौ राजा रांम रिसालू॥
जाति जुलाहा नाम कबीरा, बनि बनि फिरौं उदासी।
आसि पासि तुम्ह फिरि फिरि वैसो, एक माड एक मासी॥