(iii)सच्ची भक्ति-भावना का प्रतिपादन है।
(iv) सच्चा ईश्वर प्रेम ही जीवन का चरम फल है। यह सीधी-सी बात लोगो की समझ मे नही आती है। इसी बात को देखकर कबीर हैरान हैं।
(२७६)
राम राइ भई बिगूचनि भारी,
भले इन ग्यांनियन थै संसारी॥ टेक॥
इक तप तीरथ औगांहै, इक सांनि महातम चांहै॥
इक मै मेरी मै बीझै, इक अहंमेव मै रीझै।
इक कथि कथि भरम लगांवै, संमिता सी बस्त न पावे॥
कहै कबीर का कीजै, हरि सुझै सो अंजन दीजै॥
शब्दार्थ—विगूचनि=उलझन, कठिनाई, असमंजस, औगाहैं=अवगाहन (स्नान) करते हैं। मानि=मान, सम्मान। बीझे=बीधे, बघते हैं। अहमेव="मैं ही हूँ"—मिथ्याभिमान। कथि कथि=विभिन्न सिद्धान्तो का प्रतिपादन करना। समिता=समाप्त अथवा सवित् आत्मबोध। वस्त=वस्तु। अजन=काजल, लक्षण से ज्ञान, आँखो की दृष्टि को शुद्ध करे।
संदर्भ—कबीर के विचार से 'विवेक' ही भगवद् प्राप्ति का उचित सोपान है।
भावार्थ—हे भगवान, मेरे सामने तो बडी भारी कठिनाई उपस्थित हो गई है। इन तथाकथित ज्ञानियो (ढोगी एव पाखण्डी लोगो) की अपेक्षा तो ये ससारी लोग (गृहस्थ लोग) ही अच्छे हैं। इन ज्ञानियो मे कोई तो तप करते हैं, कोई तीर्थों मे स्नान करते हैं, कोई मान चाहते हैं ओर कोई अपने आपको (भगत जी आदि) कहलाकर) बडा दिखाना चाहते हैं। इनमे बहुत से मैं मेरा' के मोह-बन्धन मे फँसे हुए हैं और किन्ही को अपनी शेखी बघारने की लत पड गई है। इनमे कुछ लोग विभिन्न धार्मिक सिद्धान्तो का वर्णन करते हुए अपने आपको भ्रम मे फँसाए हुए हैं। परन्तु इनमे कोई भी ऐसा नही है जिसको आत्म-बोध अथवा समभाव जैसी वस्तु की प्राप्ति हो गई हो। कबीरदास कहते हैं कि तथाकथित ज्ञान और ज्ञानियो से छुटकारा कैसे हो? यथार्थ बात तो यह है कि उस ज्ञान की प्राप्ति की जानी चाहिए जिससे भगवान का दर्शन प्राप्त हो सके।
- अलकार—(i) पुनरुक्ति प्रकाश—कथि कथि।
विशेष—(i) 'अजन' ज्ञान का प्रतीक है।
(ii) अहकारी एव ढोगी ज्ञानी की अपेक्षा वह गृहस्थ कही अधिक अच्छा है जो निष्ठा पूर्वक अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है। सच्चे गृहस्थ की प्रशसा एव ढोगी ज्ञानी की भर्त्सना है।
(iii) इसमे तत्कालीन सामाजिक जीवन की भी एक झलक प्राप्त हो जाती है।