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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/४०७

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[कबीर
 

सहस्रों भावनाएँ ही इस नाम स्मरण द्वारा आपूरित हो गई हैं। वे ही इस वस्त्र की उपादान बन गई हैं। सूत को उलझने से बचाने के लिये इडा और पिंगला नामक दोनों नाडियो को दो डडो (गोडो) का रूप दिया गया है। इस वस्त्र को बुनने के परिश्रमिक के रूप में मैंने अनंत नाम-स्मरण के रूप में प्राप्त किया है, अर्थात् तुम्हारे अनंत नामों को गिन कर उन्हें मैंने अपनी मजदूरी के रूप में लिया है। इस अमूल्य निधि को मैंने अपने हृदय में ही रखा है। हरि-स्मरण रूपी इस वस्त्र के लिये मैंने सुरित और स्मृति की दो खूटियाँ बना ली हैं। इस प्रकार विवेक-रूपी वस्त्र बुनना आरम्भ कर दिया है। मैंने ज्ञान तत्व से नली भरली है और इस प्रकार इस वस्त्र को बुनते हुए मैंने आत्मसाक्षात्कार किया है। इस बुनाई की मजदूरी में मुझको अविनाशि भगवान की प्राप्ति रूपी धन प्राप्त हुआ है और मैं पूर्ण रूपेण आत्मस्थित हो गया हूँ। अन्य साधक इस आत्म तत्व को इधर-उधर सब जगह अनेक साधनाओं-रूपि अरण्यों और वनों में खोजते रहो मैंने इस तत्व को निकट ही बता दिया अर्थात् मैंने उन साधकों के स्वरूप में ही इस तत्व का सहन रूप से निर्देश कर दिया। मैंने शुद्ध मन की कूची बनाई है और ज्ञान की बिथरनी (सूत को अलग सलग रखने वाला यन्त्र) पाई है और इस प्रकार जीव के मन की गाठों और ममता की घुड़ियाँ समाप्त हो गई है और जहाँ की तहाँ लय लग गई है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम की कूची से मैंने विषय वासानाओ एवं बाह्याडम्बर के ऊपरी मैल को साफ किया है, तथा विवेक के द्वारा मन में किसी प्रकार की द्विविधा उत्पन्न नहीं होने दी है। इस प्रकार अहंकार की गाँठो और ममता के बन्धनों से मुक्त होकर जीव की लौ आत्मस्वरूप में लग गई है। माया के फेर में जो बैठे-ठाले के व्यर्थ के काम थे, वे भी समाप्त हो गए हैं और इस प्रकार आत्मा में अभय पद प्रकाशित हो गया है। कबीरदास कहते हैं कि इस हरि-स्मरण रूपी वस्त्र को बुनते हुए मुझे परम सुख (परम सत्य के साक्षात्कार) की प्राप्ति हुई है और दुःख-रूप संसार का नाश हो गया है।

अलंकार—(i) रूपकातिशयोक्ति—सम्पूर्ण पद।

(ii) साग रूपक—दस=पाई।
(iii) विरोधाभास—अनंत नाउ गिनि लई।

विशेष—(i)साधना के प्रतीकों का प्रयोग है।

(ii) नाम स्मरण की महिमा का निर्देश है। इसमें ज्ञान और योग दोनों का योग है। साधक कबीर का आत्म-विश्वास दृष्टव्य है।

(२८९)

भाई रे सकहु न तनि बुनि लेहु रे,
पीछै रांमहिं दोस न देहुरे ॥टेक॥
करगहि एक बिनांनी ता भीतरि पंच परांनी॥
तामै एक उदासी, तिहि तणि बुणि सबै बिनासी॥