(11)आन न भावै -कुछ आलोचको ने 'आन' का अर्थ 'अन्य' करके इस वाक्यांश का अर्थ इस प्रकार किया है-मुझे अन्य किसी की उपासना अभीप्सित नही है। हमारे विचार से "नीद न आवै"को साथ"आन न भावै" का अर्थ"अन्य अच्छा नही लगाता है,"ही अर्थ उपयुक्त होन चाहिए । समभाव की अभिव्यक्ति अन्यत्र देखिए-
घान न भावै नींद न आवै,विरह सतावै मोइ।
खायल-सी घूमत फिरूँ दरद न जाणे कोइ ।
(मीराबाई)
(111)ज्यूं कामी कौ वाम पियारा-तुलानात्मक दृष्टि देखिए-
कामिहि नारि पियारि जिमी, लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम ।
(गोस्वामी तुलसीदास)
(IV)है कोउ•••सुनाइ रे—तुलना करें—
प्रीतम कू पत्तियाँ लिखूँ रे कउवा क्ष! तू ले जाइ ।
जाइ प्रीतम सू ये कहें ऱे, विरहणि धान न खाइ ।
वेगि मिलो प्रभु भ्रातरं जामी , तुम बिन रह्यौ न जाई ।
(मीराबाई)
माधौ कब करिहौ दया ।
कांम क्रोध अहंकार व्यापै , नो छूटे माया ॥ टेक ॥
उत्पति ब्यंद भयौ जा दिन थे, कबहू सच नहीं पायौ ।
पच चोर सगि लाइ दिए है, इन सगि जनम गंवायौ ॥
तन मन डस्यौ भुजग भांमिनी, लहरी वार न पाप।
सो गारडू मिल्यौ नहो कबहू , पसरयौ विष विकराला ॥
कहै कबीर यहू कासू कहिये, यह दुख कोइ न जानै ।
देहु दीदार बिकार दूरि करि तब मेर मन मांनै ॥
शब्दार्थ - साँच=सुख । भुजग=सर्प । भमिनी=सुन्दरी । गारडू=सर्प का जहर उतारने वाला । विकरारा=विकराल ,भयंकर । दीदार=साक्षात्कार- दर्शन ।
सन्दर्भ -कबीर एक भक्त की तरह भगवान की तरह से दर्शन देने की प्रार्थना करते है ।
भावार्थ-हे भगवान । आप मेरे ऊपर दया करके मुझको कव दर्शन देगे ? काम क्रोध और अहंकार ने मुझको घेर रखा है और माया मुझको छोड़ते नही बनती है । जिस दिन से बिन्डु(पिना के वीर्य) से मेरा जन्म हुआ है,उस दिन से मुझे कभी भी सच्चे सुख की प्राप्ति नही हुई है । पांच चोर (काम,क्रोध ,लोभ मोह एव मत्सर)जन्म से मेरे साथ लगे हुए है। इनके साथ मैंने अपना सम्पूर्ण