(३२१)
रांम नांम हिरदै धरि, निरमोलिक हीरा।
सोभा तिहूं लोक, तिमर जाय त्रिबधि पीरा॥ टेक॥
भिसनां नै लोभ लहरि, कांम क्रोध नीरा।
मद मछर कछ मछ, हरषि सोक तीरा॥
कांमनी अरू कनक भवर, बोये बहु बीरा।
जन कबीर नवका हरि, खेवट गुरु कीरा॥
शब्दार्थ—निरमोलिक—अमूल्य, बहुमूल्य,। तिमर=तिमिर, अन्धकार, अज्ञान। बोये=डुवोये। कीरा=कीट=शुकदेव। यदि पाट कोरा है, तो अर्थ 'केवल' होगा।
सदर्भ—कबीरदास गुरुप्रसाद और हरि कृपा द्वारा भव सागर पार करने का उपदेश देते है।
भावार्थ—कबीरदास कहते हैं कि रे जीव, तुम हृदय मे राम नाम रूपी बहुमूल्य हीरे को अपने हृदय में धारण करो। इससे तीनो लोकों मे तेरी शोभा (इज्जत) होगी तथा तेरा अज्ञानान्धकार एव तेरे तीनो प्रकार (दैहिक, दैविक, भौतिक) कष्ट नष्ट हो जाए गे। (भव सरिता मे) काम और क्रोध रूपी जल भरा हुआ है, इसमे लोभ और तृष्णा की लहरे उठती रहती हैं, इसमे मद और मत्सररूपी मछलियाँ और कछुए हैं, सुख और दुःख इसके किनारे हैं तथा इसमे कामिनी और कचन रूपी भँवरें पड रही हैं। इस भव नदी मे अनेक वीर डूब चुके है। भगवान के भक्त कबीरदास कहते हैं कि भव-नाम की नाव तथा गुरु शुकदेव रूपी केवट के सहारे ही इसको पार किया जा सकता है। अथवा यह कहिए कि इसको पार करने के लिए भगवन्नाम ही नाव है और केवल गुरु ही इस नौका का केवट है।
- अलंकार—(i) साग रूपक—पूरा पद।
- (ii) व्यतिरेक की व्यजना—निरमोलक हीरा।
- (iii) छेकानुप्रास—तिमिर, त्रिविध। लोभ लहरि, काम कोध, मद मछर।
- (iv) पदमैत्री—कछ मछ।
- (v) वृत्यानुप्रास—बोये बहु बीरा
- (vi) श्लेष पुष्ट रूपक—तिमर
विशेष—(i) त्रिविध पीर—दैहिक=शारीरिक। दैविक=देवकृष्ठ। भौतिक=अत सम्बन्धी।
(ii) त्रिपना—तृष्णा भोग की इच्छा, अप्राप्त वस्तु को पाने की तीव्र इच्छा। बुद्ध ने इनी को 'तन्हा' कहा है। इसी के वशीभूत होकर जीवात्मा जन्म धारण करने को प्रेरित होता है।