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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/४४८

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ग्रन्थावली]
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(iii) हरषि सोक तीरा—प्रत्येक कार्य की परिप्रगति इष्ट की प्राप्ति (सुख) अथवा इष्ट के वियोग एव अनिष्ट की प्राप्ति (दुख) मे होती है।

(iii) वीर काम क्रोधादि पर विजय प्राप्त करने के लिए साधना करने वाला ही 'वीर' है। जैन धर्म के 'जिन' का अर्थ 'वीर' ही है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि—

महा अजय संसार रिपु जीति सकय सो वीर।

(रामचरितमानस)

(३२२)

चलि-मेरी सखी हो, वो लगन रांम राया।
जब तब काल बिनासै काया॥ टेक॥
जब लग लोभ मोह की दासी, तीरथ ब्रत न छूटै जम की पासी।
आवैगे जम के घालैगे बांटी, यहु तन जरि वरि होइगा माटी॥
कहै कबीर जे जनहरि रगिराता, पायौ राजा राम परम पद दाता।

शब्दार्थ—लगन=प्रेम। बोटी=कुचल कर।

सदर्भ—कबीरदास भगवद् भक्ति का प्रतिपादन करते हैं।

भावार्थ—रे मेरी जीवात्मा सखी! तू राजा राम के प्रेम मे मग्न हो जाओ। यह काल किसी भी क्षण इस शरीर को नष्ट कर सकता है। तुम जब तक लोभ और मोह की दासी हो तथा वीर-व्रत आदि के फेर मे पड़ी हुई हो, तब तक यम के बन्धन से मुक्त नही हो सकोगी। यम दूत आएँगे और तुमको कुचल कर (पीस-पास कर) मार डालेंगे। तुम्हारा यह शरीर जल-जल कर मिट्टी हो जाएगा। कबीरदास कहते हैं कि जो लोग राम के प्रेम पे अनुरक्त हैं, वे उन राजा राम को प्राप्त करते हैं जो परम पद को देने वाले हैं।

अलकार—(i) रूपकातिशयोक्ति सखी।
(ii) जरि बरि, जब तब, बाटी माटी।
(iii) विशेषोक्ति की व्यजना तीरथ पासी।
(iv) वृत्यानुप्राम—पायो, परम पद।

विशेष—(i) वाह्याचार का विरोध है।

(ii) राम-भक्ति की महिमा का प्रतिपादन है।

(iii) सखी' शब्द जीवात्मा अथवा अन्त करण की वृत्ति के लिए उप-लक्षण है।

(३२३)

तू पाक परमांनंदे।
पीर पैकंबर पनह तुम्हारी, मै गरीब क्या गदे॥ टेक॥
तुम्ह दरिया सबही दिल भीतरि, परमांनंद पियारे।
नैक नजरि हम ऊपरि नांही, क्या कमिबखत हमारे॥