जन्म मृत्यु आदि की धारणा ही क्पोकर की जाए? अत जन्मादिक, लोक-परलोक मे जाना आदि प्रतीति मात्र है।
(iii) कहै कबीर माँही। जीव की पृथक सत्ता केवल मिथ्या प्रतीति मात्र है। पर वह माया के ससर्ग से पृथक लगना है। शुद्ध आत्मतत्व के लिए जन्म-मरण शब्दो का व्यवहार व्यर्थ एव अनुपयुक्त है। प्राण तथा इन्द्रिय-व्यापार से असपृक्त होने के कारण साधक जीव सामान्य व्यवहार मे जीवित नही है। परन्तु ससार का व्यवहार करते हुए प्रतीत होने के कारण मरे हुए भी नही कहे जा सकते हैं। इसी से न हम जीवित हैं और न मरे हुओ मे ही हैं।
(३३२)
हंम सब माँहि सकल हम मांही,
हम थै और दूसरा नाही॥ टेक॥
तीनि लोक मै हमारा पसारा, आवागमन सब खेल हमारा॥
खट दरसन कहियत हम भेखा, हमही अतीत रूप नही रेखा॥
हमही आप कबीर कहावा, हमही अपनां आप लखावा॥
सदर्भ—कबीर उसे अवस्था का वर्णन करते हैं जब अश-अशी, भक्त भगवान, आत्मा-परमात्मा मे कोई अन्तर नही रह जाता है।
भावार्थ—हम सभी मे हैं और सब हम मे हैं। हम से भिन्न और कोई नही है। तीनो लोको मे हमारा ही प्रसार है तथा यह जन्म मृत्यु मेरी लीला मात्र है। छ दर्शन हमारे ही वेष कहे जाते हैं अर्थात् छ हो दर्शनो मे हमारे (शुद्ध चैतन्य) के ही विभिन्न रूपो का वर्णन है। हम अर्थात् चैतन्य सबमे परे का तत्व है। हमारा न कोई रूप है और न कोई आकार है। हम स्वयं ही कबीर कहे जाते हैं और हमी ने अपना आत्म तत्व विभिन्न रूपो मे दिखाया है।
शब्दार्थ—अलंकार—यमक—आप-आप
विशेष—(i) तीन लोक—आकाश, पृथ्वी, पाताल
(ii) षट्दर्शन—साख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमासा और वेदात।
(iii) उस स्थिति का वर्णन करता है जब साधक 'अह' ब्रह्मास्मि का उद्घोष कर उठता है।
(iv) अद्वैतवाद का सुन्दर प्रतिपादन है।
(v) वह परमतत्त्व सर्वथा वर्णनातीत है। इसी से विभिन्न प्रकार से उसका वर्णन करके वाणी की असमर्थता प्रकट की गई है।
(३३३)
सोधन मेरे हरि का नांउ,
गाँठि न बाँध्यौ बेचि न खांउँ॥ टेक॥
नांउ मेरे खेती नांउ मेरे बारी, भगति करौं मै सरन तुम्हारी॥
नांउ मेरे सेवा नांउ मेरे पूजा, तुम्ह बिन और न जांनौं दूजा॥