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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/४७२

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ग्रन्थावली]
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भलै नीदौ भलै नीदौ भलै नीदौ लोग,
तन मन रांम पियारे जोग॥ टेक॥
मैं बौरी मेरे रांम भरतार, ता कारनि रचि करौं स्यगार॥
जैसे घुबिया रज मल धौवै, हर तप रत सब निंदक खोवै॥
न्यंदक मेरे भाई बाप, जन्म जन्म के काटे पाप॥
न्यंदक मेरे प्रांत अधार, बिन बेगारि चलावै भार॥
कहै कबीर न्यदक बलिहारी, आप रहै जन पार उतारी॥

शब्दार्थ—नीदौ=निंदा करो। बौरी=पागल। रज=मिट्टी। हरत- परत=विभिन्न प्रयत्नो द्वारा। वेगारि=मजदूरी।

सन्दर्भ—कबीरदास निंदक को साधक का उपकारी बताते हैं।

भावार्थ—ईश्वर के प्रति दाम्पत्य भाव मे तन्मय आत्मा सुन्दरी कह रही है कि भले ही मेरी निंदा करो, भले ही मेरी निंदा करो, लोगो भले ही मेरी निंदा करो। मेरे तन और मन प्यारे राम के सयोग मे अनुरक्त रहते हैं। राम मेरे पति हैं और मैं उनके पीछे पागल हूँ उनको रिझाने के लिए मैं अच्छी तरह रुचि पूर्वक श्रृंगार करती हूँ। जिस प्रकार धोवी कपडो के मैल मिट्टी को घोता है, उसी प्रकार निंदा करने वाला व्यक्ति विविध प्रकार से निंदा करके भगवान की तपस्या मे लगे हुए साधक के समस्त अवगुणों को दूर कर देता है। निंदक को मैं माता-पिता की भाँति अपना हितैषी मानता हूँ क्योकि वह जन्म जन्मान्तर के पाप दूर कर देता है। निंदक मुझे प्राणो के समान प्रिय है क्योकि वह बिना किसी प्रकार का पारिश्रमिक लिए ही मुझे अवज्ञा का भार सहन करने योग्य बना देता है। कबीरदास कहते हैं कि मैं निन्दक पर बलिहारी जाता हूँ। वह स्वयं तो भवसागर मे रह जाता है और भक्त जन को भवसागर के पार उतार देता है।

अलंकार—(i) पुनरुक्ति प्रकाश—प्रथम पंक्ति। जनम जनम।
(ii) उदाहरण—जैसे—खोवै।
(iii) उल्लेख—निंदक का विभिन्न रूपों में वर्णन।
(iv) विभावना की व्यजना—बिन बेगारि—भार।
(v) व्याज स्तुति—सम्पूर्ण पद।

विशेष—(i) इस पद मे व्याज स्तुति द्वारा दिखाया है कि निंदा पाप कर्म है एव बन्धन का हेतु है।

(ii) निंदा के प्रति सहिष्णु व्यक्ति अपने दोषो के प्रति जागरूक हो जाता और अपने अवगुणों को क्रमश दूर करता रहता है। रहीम ने भी इसी प्रकार का कथन किया है।

निंदक नियरे राखिए आंगन कुटो छबाइ।
बिन पानी साबुन बिना निरमल करै सुभाइ।