कर कहते हैं कि इसीलिए हे जीव, तुम भगवान मे निरन्तर अपनी लौ लगाए रहो। (यही कल्याण का मार्ग है)
- अलंकार—(i) रूपकातिशयोक्ति—स्यध, वन, स्याल।
- (ii) गूढोक्ति—किन सुमिरौ।
- (iii) विरोधाभास—उलटि स्याल खाइ; जीत्या, तिरै, जीवत ही मरै।
विशेष—(i) नाथ पथी प्रतीको का प्रयोग है।
(ii) यह पद उलटवॉसी की शैली पर रचित है।
(iii) 'अहकार' के रहते हुए प्रभु कैसे आ सकते है? प्रेम-गली अत्यन्त सकरी है। इसमे 'मैं' और 'तू' मे एक ही रह सकता है।
प्रेम गली अति साँकरी तामे दो न समाँय।
रहिमन भरी सराइ लखि लौट मुसाफिर जाय।
(३५०)
जागि रे जीव जागि रे।
चोरन कौ डर बहुत कहत हैं, उठि उठि पहरै लागि रे॥ टेक॥
र करि टोप ममां करि बखतर, ग्यान रतन करि षाग रे।
ऐसै जौ अजराइल मारै, मस्तकि आवै भाग रे॥
ऐसी जागणीं जे को जागै, ता हरि देइ सुहाग रे।
कहै कबीर जाग्या ही चाहिये, क्या गृह क्या बैराग रे॥
शब्दार्थ—बखतर=कवच। वाग=खड्ग, तलवार। अजराइल=अजराइल=मृत्यु का देवदूत।
सन्दर्भ—कबीर कहते हैं कि व्यक्ति को सदैव विवेकपूर्ण आचरण करना चाहिए।
भावार्थ—रे जीव, जागो, जाग जाओ। इस जीवन मे (काम क्रोध, लोभ, मोह मत्सर) रूपी चोरों का डर बहुत कहा जाता है। इसलिए तू उठ और उठकर पहरा लगा जिससे बोध वृत्ति रूपी धन की रक्षा होती रहे।) इसके लिए तू राम के नाम का इस प्रकार महारा ले—रकार का शिरस्त्राण बना तथा मकार का कवच बना। ज्ञान रूपी रत्न की तलबार बनाले। इससे अज्ञान रूपी मृत्यु के देव दूत पर तुम ऐसा वार करो कि अहकार-रूपी उसका मस्तक पर तुम्हारा अधिकार हो जाए। ऐसी जाग मे जो कोई जागता है अर्थात् जाग कर जो कोई इस प्रकार सावधान रहता है, उन पर भगवान अपने सौभाग्य की कृपा करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो आत्मा-सुन्दरी इस प्रकार की ज्ञानावस्था को प्राप्त करती है, उसको भगवान पति रूप में प्राप्त होने हैं अर्थात् आत्मा का परमात्मा में, साथ का अनन्त में तय हो जाता है। कबीर कहते हैं कि चाहे व्यक्ति गृहस्थ हो अथवा विरक्त, उसको सदैव विकार रूपी चोरो के प्रति सावधान रहना ही चाहिए।