- (iv) चपलातिशयोक्ति की व्यजना-जन जाग्या रीते।
- (v) उपमा—विष से पुराण।
- (vi) रूपक—राम रतन।
विशेष—(i) विष पुराण—वेद-पुराण इत्यादि ज्ञान प्राप्ति के साधन मात्र हैं। सिद्धावस्था मे उनकी निरर्थकता स्वय सिद्ध है। इस कथन के ऊपर अविद्यावत् विषयाणि सर्वशास्त्राणि का प्रभाव स्पष्ट है।
(ii) अन्तिम पक्ति मे 'सोवौ' का पाठान्तर "सोबौ" है। अर्थ होगा—अब सोना नही है अर्थात् अब तुम मत सोओ। यह अर्थ भी सगत एव प्रसगानुकूल है।
(iii) समभाव के लिए देखें—
अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
पायौ नाम चारु चिंतामनि, डट कर ते न खसैहौं।
(गोस्वामी तुलसीदास)
(३५३)
सतनि एक अहेरा लाधा,
मिर्गनि खेत सबनि का खाधा॥ टेक॥
या जगल मै पांचौ मृगा, एई खेत सबनि का चरिगा॥
पारधीपनौं जे साधै कोई, अध खाधा सा राखै सोई॥
कहै कबीर जो पचौं मारै, आप तिरै और कूं तारै॥
शब्दार्थ—अहेरा=शिकार। लाधा=प्राप्त किया। मिर्गनि=मृगो ने खाधा=खा डाला। पारधीपना=शिकारीपना।
सन्दर्भ—कबीर का कहना है कि इन्द्रियो को वश मे करने वाला भवसागर के पार जा सकता है।
भावार्थ—सतो को एक शिकार प्राप्त होगई है। मृगो (काम-क्रोधादि अथवा पाँचो इन्द्रियो के विषयो) ने सब लोगो के जीवन-रूपी खेत चर डाले है। इस ससार रूपी जगल मे पाँच मृग (उपर्युक्त अनुसार) हैं। इन्होने ही समस्त प्राणियो के जीवन-रूपी खेतो को चर लिया है। जो कोई व्यक्ति इन मृगो को मारने के लिए शिकारीपना धारण करते हैं, वह इन मृगो के आधे खाए हुए जीवन-रूप खेत की रक्षा कर लेता है। कबीर कहते हैं कि जो पाँचो विकारो एवं पाँचो इन्द्रियो के विषयो को समाप्त कर देता है, वह स्वय ही भवसागर के पार हो जाता है और अन्य लोगो को भी पार करा देता है।
- अलंकार—(i)रूपकातिशयोक्ति—मृग खेत।
- (ii) सागरूपक—खेत और जीवन के रूपक का निर्वाह है।
विशेष—(i) पारधीपनौं जे साधे—विषयासक्ति पर नियन्त्रण के अनुपात मे ही साधक का कल्याण होता है।