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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/४९५

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[कबीर
 

हो जाएँगे। जब तक अन्तःकरण मे द्वैत की भावना है, भेद-बुद्धि है, तब तक शरीर स्थित मन्दिर, जिसमे प्रभु का वास है, का रहस्य प्राप्त नही किया जा सकता है। कबीरदास कहते हैं कि राम मे रमण करते हुए मन पर राम के अनुराग का रंग चढ जाता है और अन्तःकरण निर्मल हो जाता है।

अलंकार—(i) पुनरुक्ति प्रकाश—बार बार।
(ii) रूपक—काय थंभ। अनहद बेन। हिरदा कवल।
(iii) छेकानुप्रास—गुण गावै, गुर गमि; अखड अहनिसि; सोमवार ससि। मन मतिवाला।
(iv) वृत्यानुप्रास—रमिता राम रंग।
(v) रूपकातिशयोक्ति—ससि, दुवार, दोऊ। महलि।
(vii) चपलातिशयोक्ति—चाखत निसतरै।

विशेष—(i) ये समस्त मान्यताएँ योगियों मे प्रचलित हैं जो अद्यतन किसी न किसी रूप मे कबीर पथियो मे भी मानी जाती हैं।

(ii) जिनि बाहिर जाइ—कबीर संसार छोड़ने की बात नही कहते हैं। उनका तो निश्चित मत था कि अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए ही सच्ची भक्ति हो सकती है। वह स्वय जुलाहे का व्यवसाय करते थे।

(iii) अनहद बेन—देखें टिप्पणी पद सख्या १५७।

(iv) ससि—देखे टिप्पणी पद सं॰ ४, ७, २१०।

(v) त्रिकुटी—देखें टिप्पणी पद सं॰ ३, ४।

(vi) त्रिकुटी सगम—देखें टिप्पणी पद सं॰ ७ ।

(vii) सहज—देखें टिप्पणी पद स॰ १५५।

(viii) बाहर भीतर प्रकाश वाह्य दृष्टि द्वारा सत्यासत्य का विवेक होता है तथा अन्तःदृष्टि द्वारा सत्य की अनुभूति होती है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि—

राम नाम मणि दीप घरि जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर वाहिरेहु जो चाहसि उजियार।

(३६३)

राम भजै सो जांनिये, जाके आतुर नांहीं।
सत संतोष लीयै रहै, धीरज मन मांहीं॥
जन कौं कांम क्रोध व्यापै नहीं, त्रिष्णां न जरावै।
प्रफुलित आनंद मै, गोव्यंद गुंण भावै॥
जन कौं पर निंद्या भावै नहीं, अरु असति न भाषै।
काल कलपनां मेटि करि, चरनूं चित राखै॥
जन सम द्रिष्टी सीतल सदा, दुविधा नही आनै।
कहै कबीर ता दास सूं मेरा मन मांने॥