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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५००

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ग्रन्थावली]
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(iii) कुशल दीन्हा रे। वैभव लेकर भी व्यक्ति कुशल- पूर्वक बना रहे—यह नही होने का। देखिए—

दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाइब गाला।
दानि कहाइब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुशल रौताई।

(गोस्वामी तुलसीदास)

(iv) दिवस रे कहावत प्रचलित है—"चार दिनों की चाँदनी फेरि अधेरी रात।"

(v) सबहि पयानां कीन्हा रे—समभाव की अभिव्यक्ति देखे—

हाय दई ! यह काल के ख्याल में फूल से भूलि सबै कुम्हलाने।
देव-अदेव कली-बलहीन चले गये मोहि की हाँस हिलाने।
यो जग बीच बचे नहि मीच पे, जे उपजे ते मही में मिलाने।
रूप- कुरूप - गुनी-निगुनी जे जहां जनमे ते तहाँ ही बिलाने।(देव)

(३६७)

मन बनजारा जागि न सोई,
लाहे कारन मूल न खोई॥ टेक॥
लाहा देखि कहा गरबांना, गरब न कीज मूरिख अयांनां॥
जिन धन सच्या सो पछितांनां साथी चलि गये हम भी जांनां॥
निसि अधियारी जागहु बदे, छिटकन लागे सबही संधे॥
किसका बंधू किसकी जोई, चल्या अकेला संगि न कोई॥
ढरि गए मंदिर टूटे बंसा, सूके सरवर उढ़ि गये हंसा॥
पंच पदारथ भरिहै खेहा, जरि बरि जायगी कंचन देहा॥
कहत कबीर सुनहु रे लोई, रांमनांम बिन और न कोई॥

शब्दार्थ—बनजारा=व्यापार करने वाला, बनिज, व्यापारी । लाहे=लाभ छिटकन=बिछुडना। सबे=सगी साथी। जोई=योगिता, स्त्री बसा=वश। पच पदारथ=पच महाभूत। खेहा=मिट्टी। लोई=लोगो अथवा कवीर की शिष्या पत्नी।

संदर्भ—कबीरदास ससार की निस्सारता का प्रतिपादन करते है।

भावार्थ—रे मन रूपी व्यापारी, तू जग जा। सो मत । लाभ के फेर मे तू अपनी गाँठ की पूँजी मत गँवावे सुख-सुविधा को प्राप्त करने मे लगे हुए हो। ये सुख तो चक्कर मे तुम अपने आत्मा के मूल तत्व आनन्द-स्वरूप हो। तुम वस्तु स्थिति को समझ कर इस चक्कर से निकल मिथ्या हैं और इनके को व्यर्थ ही नष्ट कर रहे सुखो को प्राप्त करके तुम्हे क्यों अभिमान हो गया है? हे सासारिक सुखो पर अभिमान मत करो। जिन लोगो ने धन आयो। सासारिक अज्ञानी मूखं तू इन का सचय किया, वे सब पछताए। हमारे सब साथी मृत्यु के ग्रास होकर इस ससार से चले गये हैं।