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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५०१

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हमको भी एक दिन जाना ही है। हे मानव! यह जीवन अंधेरी रात्रि के समान है। तू जग जा। तेरी समरत सगी साथी तुमसे बिछुड़ने लगे हैं। इस जगत मे कौन किसका भाई है और कौन किसकी स्त्री है? जीव को अकेले ही जाना पडता है। कोई किसी के साथ नही जाता है। सारे महल गिर कर नष्ट हो गये, इनमे रहने वाले परिवार समाप्त हो गये, तालाब सूख गये और उन पर रहने वाले हस भी उड गये सासारिक वैभव का प्रतीक पच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और प्रकाश) से निर्मित यह शरीर मिट्टी मे मिल जाता है और सोने की भी देह जल कर भस्म हो जाती है। कबीर कहते हैं कि रे लोगो, सुनलो। राम-नाम के अतिरिक्त यहाँ अन्य कोई सहारा नही है।

अलंकार—(i) रूपक—मन बनजारा।
(ii) गूढोक्ति - कहा गरबाना।
(iii) निदर्शना की व्यजना—निसि सधे।
(iv) वक्रोक्ति - किसका जोई।

विशेष—(i) लक्षणा—पच पदारथ।

(ii) जीवन और जगत की असारता का प्रतिपादन है।

(iii) 'निर्वेद' सचारी की व्यजन है।

(३६८)

मन पतंग चेते नहीं जल अंजुरी समांन।
बिषिया लागि विचिये, दाझिये निदांन॥ टेक॥
काहे नैन अनदियै, सूझत नहीं आगि।
जनम अमोलिक खोइयै, सांपनि संगि लागि॥
कहै कबीर चित चंचला, गुर गांन कह्यौ समझाइ।
भगति हीन न जरई जरै, भावै तहां जाइ॥

शब्दार्थ—अँजरी=अजुली। विचिक=बर्बाद करता है। दाभिये=जल जाएगा। निदान=अन्ततः।

संदर्भ—कबीर माया ग्रस्त जीव को सावधान करते हैं।

भावार्थ—यह मन-रूपी पतंगा चेतता नही है और माया रूपी दीपक पर प्राण देता है। वह इस बात को नही समझता है कि जीवन अंजलि-बद्ध जल के समान क्षणिक अस्तित्व वाला है । यह मन विषयो मे आसक्त होकर नष्ट हो रहा है। अन्ततः इसको जलना ही है। तू संसार की चीजो को नेत्रों से देख कर क्यो आनन्दित होता है? तुमको वासनाग्नि (देखने की आसक्ति मे निहित संताप)—क्यो नही दिखाई देती है? वासना रूपी सापिन के साथ लगा कर तूने अपने बहु- मूल्य जीवन को व्यर्थ ही बर्बाद कर दिया। कबीर कहते हैं कि यह चित्त तो बिजली के नमान चन्चल है। यह बात मुभवो गुरु ने ममभाकर बताई है। भक्तिहीन तो निश्चय हो ससार मे विषयाग्नि मे जलता है, क्योकि वह विना सोचे विचारे विषयो