विशेष—(i) साधना के प्रतीको का प्रयोग है।
(ii) जीव की शोभा ईश्वर-प्रेम है। इससे उसे हार कहते हैं। इस वर्णन पद्धति पर सूफियो की पीर और उनके दाम्पत्य प्रेम का गहरा प्रभाव है। यथा—
सखी एक तेइ खेल न जाना। मै अचेत मनि-हार गँवाँना।
कवल डार गहि में बेकरारा। कासो पुकारौं आपन हारा।
घर पैठत पूँछब यह हारू। कौन उतर पाइब पैसारू
न जानौ कौन पौन लेड आवा। पुन्य दसा मैं, पाय गँवावा।
ततखन हार बेगि उतिराना। पावा सखिन्ह चंद विहँसाना।'
(मानसरोदक खण्ड, पद्मावत, मलिक मुहम्मद जायसी।)
यहाँ चद शब्द पद्मिनी के लिए प्रयुक्त है, जो बुद्धि या शुद्ध चित्तवृत्ति की प्रतीक है।
(iii) कबीर ने यहाँ यह वर्णन सामान्य भारतीय बघू की मनः स्थिति की दृष्टि से किया है। एक कुल-वधू का आभूषण खो जाने पर उसे सास और पति का डर सताने लगता है। इस प्रकार कबीर द्वारा इस मनोदशा का वर्णन बहुत ही मार्मिक एव स्वाभाविक बन गया है।
(iv) हार गुहयौ राम ताग—राम-प्रेम ही इस हार का मूलाधार है। इसी से उसको 'तागा' कहते हैं। यथा—
जुगुति बेध पुनि पोहिय राम चरित बर तागा।
पहिरै सज्जन विमल उर जिनके अति अनुरागा।
(गोस्वामी तुलसीदास)
(v) लागै मोति—मुक्ति को मुक्ता कहते हैं। इसमे श्लेष के चमत्कार के साथ साधर्म्य की भावना भी मुखरित रहती है—
मुक्ति-मुक्ता कौ मोल-मालही कहा है,
जब मोहन ला पै मन-मानिक ही वार चुकीं।
(जगन्नाथदास रत्नाकर)
(vi) सवाद शैली का सुन्दर प्रयोग है।
(vi) पच सखी—लीन्ह। विषयासक्ति के वशीभूत होकर ही जीव इस त्रिगुणात्मक जगत मे लिप्त होता है। यही उसका माया के वशीभूत होकर शुद्ध चित्त-वृत्ति का खो जाना है। यह माया ही पडौसिन है।
पड़ौसिन के लिए देखें टिप्पणी पद संख्या ३७ ।
(३७९)
नहीं छाड़ौं बाबा राम नांम,
मोहि ओर पढन सूं फोन कांम॥ टेक॥