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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५१४

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ग्रन्थावली]
[८२९
 

प्रह्लाद पधारे पढ़न साल, संग सखा लीवै बहुत बाल॥
मोहि कहा पढ़ावै आल जाल, मेरी पाटी मै लिखि दे श्री गोपाल॥
तब सनां मुरकां कह्यौ जाइ, प्रहिलाद बंधायौ बेगि आइ॥
तू राम कहन की छाड़ि बांनि बेगि छुड़ाऊ मेरौ कह्यौ मांनि॥
मोहि कहा डरावै बार बार, जिनि जल थल गिर कौ कियौ प्रहार॥
बांधि मारि भावै देह जारि, जे हू रांम छाडौ तौ मेरे गुरहि गारि॥
तब काढ़ि खड़ग कोप्यो रिसाइ, तोहि राखनहारौ मोहि बताइ॥
खभा मै प्रगट्यौ गिलारि, हरनाकस मार्यो नख बिदारि॥
महापुरुष देवाधिदेव, नरस्यंध प्रकट कियौ भगति भेव।
कहै कबीर कोई लहै न पार, प्रहिलाद ऊबार्यौ अनेक बार॥

शब्दार्थ—साल=चटसाल, पाठशाला। आल-बाल=इधर उधर की बातें। पाटी=पट्टी। सडा मुरका=सब लडको। गिलारि=मुरारि।

सन्दर्भ—कबीर भगवान की भक्त-वत्सलता का वर्णन करते हैं।

भावार्थ—मैं राम नाम छोडूँगा। मुझ को राम-नाम के अतिरिक्त और और कुछ पढने से क्या काम है? प्रहलाद अनेक बाल-सखाओ के साथ पाठशाला मे पढने के लिए गये। उन्होने अपने अध्यापक से कहा कि मुझे इधर-उधर की व्यर्थ की बातें क्यो पढाते हो? मेरी तख्ती पर तो आप केवल 'श्रीगोपाल' लिख दें। इसके बाद सब लडको ने जाकर प्रहलाद के पिता से शिकायत की। वह तुरन्त आकर प्रहलाद को बाँधकर ले गये। उन्होने प्रहलाद से कहा कि तू राम-नाम कहने की आदत छोड दे। तू मेरा कहना मान जा। मैं तुझ को अभी हाल बन्धन मुक्त कर दूँगा। प्रहलाद ने उत्तर दिया, "आप मुझे बारबार क्या डरा रहे हैं? आप चाहे तो मेरे ऊपर जल थल पर्वत कही भी ले जाकर प्रहार करें। मुझे बाँध कर मार दें, अथवा मेरी देह को जला दें। अगर मैं राम-नाम को छोड़ दूँगा तो मेरे गुरुदेव (अन्त करण की शुद्ध-चैतन्य वृत्ति) का अपमान होगा। तब पिता ने क्रोध पूर्वक तलवार निकाल कर कहा, "अब मुझे बता, तेरा रक्षक कहाँ है।" उसी समय खम्भे मे भगवान मुरारि प्रकट हुए और उन्होने हरिण्यकशिपु को नाखूनो से फाड कर मार डाला। भक्ति भाव ने महापुरष एव सम्पूर्ण देवताओ के स्वामी नृसिंह भगवान को प्रकट किया था। कबीर कहते हैं कि उनकी शक्ति का पार कोई नही पा सकता है। उन्होने अनेक बार प्रहलाद सदृश भक्तो का उद्धार किया है।

अलंकार—(i) वक्रोक्ति—मोहि काम।
(ii) दृष्टान्त—प्रहलाद बाल।
(iii) पदमैत्री—आल जाल। कानि, मानि। जल थल।
(iv) पुनरुक्ति प्रकाश—बार-बार।
(v) सम्बन्धातिशयोक्ति—कोई लहै न पार।