इससे अनत कला वाले भगवान से तुम्हारा साक्षात्कार होगा और तुम्हारे मन को आत्मानन्द की प्राप्ति होगी।
- अलंकार—(i) रूपकातिशयोक्ति—सुवा, मीना। बसंत।
- (ii) पुनरुक्ति प्रकाश—बार बार।
- (iii) रूपक—अंजन मजन विकार; भौबन्ध।
- (iv) पदमैत्री—अजन भंजन।
- (v) सभग पद यमक—जुग जुगत।
विशेष—(i) बाह्याचार का विरोध है।
(ii) सत्सग एवं गुरु की महिमा का प्रतिपादन है।
(iii) वसंत—वसन्तोत्सव वसत पंचमी से होली की पूर्णिमा तक (४० दिन तक) मनाया जाता है।
(३८२)
बनमाली जांनै बन की आदि,
राम नांम बिन जनम बादि॥ टेक॥
फूल जु फूले रुति बसंत, जामै मोहि रहे सब जीव जंत॥
फूलनि मैं जैसे रहै तबास, यूं घटि घटि गोविंद है निवास॥
कहै कबीर मनि भया अनद, जगजीवन मिलिवौं परमानंद॥
शब्दार्थ—आदि=आरम्भ, उत्पत्ति। बादि=व्यर्थ। रुचि बसत। आसक्ति का ससार। फूल=भोग-विलास।
सन्दर्भ—कबीर दास प्रभु-साक्षात्कार के आनन्द का वर्णन करते हैं।
भावार्थ—वनमाला धारण करने वाले प्रभु रूपी वनमाली इस जगत् रूपी वन के आदि (उत्पत्ति) को जानते हैं। राम-नाम के बिना यह जीवन व्यर्थ है। ऋतुवसत रूपी आसक्ति के ससार मे विभिन्न आकर्षक भोगो के रूप मे जो फूल फूले हुए हैं, उनके द्वारा जगत के समस्त जीव जन्तु मोहित हो रहे हैं—अपने कर्तव्य को भूले हुए हैं। जिस प्रकार फूल मे सुगध रहती है, उसी प्रकार सबके अन्तःकरणो मे भगवान व्याप्त हो रहे हैं। कबीरदास कहते हैं कि जब परमानद रूप जगजीवन (ईश्वर) का साक्षात्कार हुआ, लौ मन आनदित हो गया।
- अलंकार—(i)रूपकातिशयोक्ति—सम्पूर्ण पद। वन, फूल, वसंत।
- (ii) साग रूपक—जीवन और वन का रूपक।
- (iii) परिकराकुर—वनमाली।
- (iv) उदाहरण—फूलनि निवास।
- (vi) पुनरुक्ति प्रकाश—घटि घटि।
- (vii) रूपक—जगजीवन परमानंद।
विशेष—(i) वन को आदि—संगार का प्रारम्भ कब और कैसे हुआ, यह अगम्य प्रश्न है। इसी से उसको भगवान ही जानते हैं।