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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५१८

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ग्रन्थावली]
[८३३
 


(ii) जीवन के प्रति वैराग्य, भगवान के सर्वव्यापकत्व एव भगवन्नाम-स्मरण का प्रतिपादन है।

(iii) फूलनि मे निवास।—समभाव देखिए—

ज्यों तिल माही तेल है, ज्यो चकमक में आग।
तेरा साईं तुज्झ में जाग सकै तो जाग।
तेरा साईं तुज्भ में, ज्यूँ, पुहुपन में वास।
कस्तूरी के मिरग ज्यूँ, फिरि-फिरि सूँघे घास।

(३८३)

मेरे जैसे बनिज सौं कवन काज,
मुल घटै सिरि बधै ब्याज॥ टेक॥
नाइक एक बनिजारे पांच, बैल पचीस कौ संग साथ॥
नव बहियां दस गौंनि आहि, कसनि बहतरि लागे ताहि॥
सात सूत मिलि बनिज कीन्ह, कर्म पयादौ सग लीन्ह॥
तीन जगाती करत रारि चल्यौ है बनिज वा बनज झारि॥
बनिज खुटानौं पूजि टूटि, षाडू दह दिसि गयौ फूटि॥
कहै कबीर यहु जन्म बाद, सहजि समांनू रही लादि॥

शब्दार्थ—बनिज=व्यापार अथवा व्यापारी। वनजारे=टाँडा लादकर चलने वाले व्यापारी। कसनि=कसनियाँ। गवनि=गूनें, बोरियाँ। सात सूत=सात धातु। जगाती=कर लेने वाले। खटानौं=समाप्त हो गई। टाडो=सामान।

संदर्भ—कबीरदास बासनामय जीवन की निरर्थकता का वर्णन करते हैं।

भावार्थ—मेरे द्वारा किए जाने वाले व्यापार से क्या लाभ हो सकता है, जिसमे मूल धन (आत्म तत्त्व) घटता जाता है और बधन के हेतु कर्म-रूपी ब्याज की वृद्धि होती जाती है। नायक एक है और पांच बनजारे (जो विषय भोगो को खरीदते हैं।) शरीर के २५ प्रकृति रूपी पच्चीस बैल विषयो का बोझ ढोते हैं। इन बैलो पर नापने के नौ हाथ (चार अन्त करण एव पच प्राण) तथा दस इन्द्रियो (उनके विषय) रूपी दस बोरियाँ लदी हुई हैं। इनको शरीर की बहत्तर नाडियो रूपी रस्सियो से बाँधा गया है। सात धातुओ ने मिलकर शरीर के इस व्यापार को मालूम किया था और भाग्य रूपी प्यादे (पैदल चलने वाला सैनिक) को अपने साथ ले लिया था (वही मार्गदर्शक एव रक्षक है।) सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण रूपी ये तीन कर (टैक्स) उगाहने वाले झगडा कर रहे हैं। इन्होने कर के लिए इतना झगडा किया अथवा झगडा करके इन्होने इतना कर वसूल कर लिया कि इस जीवन रूपी व्यापारी को सम्पूर्ण जीवन रूपी वाणिज्य की सामग्री इन तीनो गुणो को समर्पित कर देनी पडी और जीव रूपी व्यापारी यहाँ से हाथ झाडकर चल दिया। अब तो व्यापार समाप्त हो गया (उसमे टोटा आ गया है), पूँजी कम पड़ गई है और यह चैतन्य रूपी टाँडा दस इन्द्रियो रूपी दसो